Thursday, June 19, 2014

Hindi Motivational Stories............................ महर्षि दधीचि

महर्षि दधीचि

   महर्षि अथर्वा की पत्नी शान्ति से दधीचि जी का जन्म हुआ था। और बचपन से ही दधीचि बड़े शान्त, परोपकारी और भगवान के भक्त थे। उन्हें भगवान का भजन करना और तपस्या में लगे रहना, यही अच्छा लगता था। कुछ बड़े होने पर पिता से आज्ञा लेकर वे तपस्या करने चले गये और हिमालय पर्वत के एक पवित्र शिखर पर सैकड़ों वर्षो तक तप करते रहे।

      पुराणों में ऐसी बहुत सी दृश्य लिखे गए है। उस काल में कुछ ऐसी बात हुई की असुर और देवताओं में लड़ाई हुई और त्वष्टा के पुत्र वूत्रासुर ने स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को उसे जीत ने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। तो सब भगवान नारायण के शरण में गये। और उपाय पूछा तो भगवान नारायण जी ने कहा - ' वूत्रासुर को कोई नहीं मार सकता। वह शेष जी का भक्त था। अगर उसे मारना ही है तो एक ही उपाय है महर्षि दधीचि की हड्डियों से बना वज्र के द्वारा इंद्रा ही मार सकते है। महर्षि दधीचि इतनी बड़ी तपस्या की है कि उनकी हड्डियों में अपार शक्तियाँ है और वे इतने परोपकारी है की माँगा ने पर वो अपनी हड्डियाँ अवश्य दे देंगे। '

   सभी देवता दधीचि के आश्रम गये और दधीचि उनको देख उनका स्वागत किया और कारण पूछा तब इंद्रा ने सारी बात बताई। दधीचि ने कहा - ' उसने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा, मैं उसे बिना कारण शाप नहीं दे सकता। अब आप ही बताइये कि मैं कैसे आपको सहयोग दूँ।' इंद्रा ने कहा ' भगवान नारायण ने बताया है आप की हड्डियों में अपार शक्तियाँ है और उस का द्वारा बने वज्र से ही वूत्रासुर को हार हो सकती है दूसरा कोई उपाय नहीं है। और आपकी कृपा हो तो हम विजय बन सकते है हम आपसे प्रार्थना करते है। ये कहा कर देवताये दधीचि के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहे।'

  महर्षि दधीचि बहुत प्रसन्न हुवे।  और बोले - ' यह तो बहुत उत्तम बात है। मृत्यु तो एक दिन आना है। और किसी का उपकार करने में मृत्यु हो जाय, इस से उत्तम बात और क्या होगी। मैं अभी शरीर छोड़ रहा हूँ। आप लोग मेरी सब हड्डियाँ ले लें। '  महर्षि ने आसन लगाया, आँखे बंद किये और योग के द्वारा शरीर छोड़ दिया। और जंगली जानवर आकर उन्होंने दधीचि के देह का सब चमड़ा और मांस आदि चाट लिये। उनकी बची सारी हड्डियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया। उसी वज्र से इंद्रा ने वूत्रासुर को मारा। और स्वर्ग का अधिकारी बने।

सीख - परोपकारी बनो। दुसरो का उपकार करने के लिये अपनी शरीर की हड्डियाँ तक देने वाले महर्षि दधीचि मरकर भी अमर हो गये। जब तक पृथ्वी रहेगी, लोग उनका गुणगान करेंगे उन्हें याद करेंगे और आदर से सिर झुकायेंगे।