Friday, June 20, 2014

Hindi Motivational Stories............................. लिखित मुनि की सचाई

लिखित मुनि की सचाई

  ये बहुत पुरानी पुराणों की कहानी है जिस में सच्चाई को समझने और उसका दण्ड ख़ुशी से स्वीकार करने की एक कला को बताया है और ये योगी या तपस्वी सहज कर सकते है। उत्तर दक्षिण में एक गाँव में शंख और लिखित नाम के दो मुनि थे। दोनों सगे भाई थे। दोनों अलग - अलग आश्रम बनाकर रहते थे और भगवान का भजन करते थे। ये दोनों मुनि धर्मशास्त्र के बड़े भरी विद्वान थे। इन्होने स्मृतियाँ बनायीं है। शंख मुनि बड़े  भाई थे और लिखित छोटे।
 
   एक बार लिखित मुनि अपने बड़े भाई शंख मुनि से मिलने के उनके आश्रम गये। शंख मुनि उस समय वन में गये थे। और लिखित मुनि को भूख लगी थी तो उसने आश्रम के पास में लगे वृक्ष का पक्का हुआ फल तोड़कर खाने लगे और उसी समय शंख मुनि वहाँ आ गये। अपने छोटे भाई को देख उन्हें प्रसन्नता हुई और हाथ में फल देख कर उन्हें कुछ खेद भी हुआ। उन्होंने पूछा "लिखित !  ये फल तुम्हें कहा से मिला ? ' लिखित मुनि ने कहा -'भैया ! यह तो आपके आश्रम के वृक्ष से मैंने तोड़ा है। ' शंख मुनि ने कहा - कोई बिना पूछे किसी की वस्तु ले तो उस कार्य को क्या कहा जायेगा ? लिखित मुनि ने कहा - चोरी  शंख मुनि ने कहा - चोरी करने वाले को क्या करना चाहिये ? लिखित मुनि ने कहा - उसे राजा के पास जाकर अपनी बात बताना चाहिये और जो दण्ड मिले उसे भोगना चाहिये। अगर कोई ऐसा नहीं करता तो मरने के बाद यमराज के दूत उन्हें पकड़कर नरक में डाल देते है। और बहुत दुःख देते है।

  शंख मुनि ने कहा - ' तुमने मुझ से पूछे बिना मेरे आश्रम के फल लेकर चोरी का पाप किया है। अब तुम राजा के पास जाकर इस पाप का दण्ड ले लो और उसके बाद ही यहाँ आओ। '

        लिखित मुनि वहाँ से राजा के पास गये और सारी बात बता दी और अपनी अपराध का सजा सुनाने के लिए कहा राजा ने कहा -'जैसे राजा दण्ड देता है, वैसे ही क्षमा भी कर सकता है, मैं आपका अपराध क्षमा करता हूँ। लिखित मुनि बोले -' धर्मशास्त्र के नियम मुनिलोग बनाते है। राजा को तो प्रजा से उन नियमो का पालन कराना चाहिये। मैं  क्षमा लेने नहीं आया, दण्ड लेने आया हूँ। मेरे बड़े भाई ने स्नेहवश, मेरा कर्तव्य सुझाकर मुझे यहाँ भेजा है। मुझे अपराध का दण्ड दो। '

  राजा को मुनि की बात मानना पड़ा। उन दिनों चोरी के अपराध का दंड था चोर के दोनों हाथ काट लेना।  राजा की आज्ञा से जल्लादने मुनि के दोनों हाथ काट लिये। हाथ काट जाने से लिखित मुनि को दुःख नहीं हुआ।  वे बड़ी प्रसन्नता से शंख मुनि के आश्रम में लौट आये और बोले -'भैया ! मैं अपराध का दण्ड ले आया। '

          शंख मुनि छोटे भाई को ह्रदय से लगाया और कहा - तुमने बहुत अच्छा किया। आओ, अब स्नान करके दोपहर की संध्या करें।  नदी के जल में स्नान करने जब में डूबे तो तैरने के लिए जब लिखित मुनि ने अपने हाथ बढ़ाये तो दोनों हाथ पुरे निकल आये। वे समझ गए कि यह उनके बड़े भाई की कृपा का फल है। उन्होंने बड़ी नम्रता से पूछा -' भैया ! जब मेरे हाथ उगा देने थे तो आपने ही उन्हें यहाँ क्यों नहीं काट लिया ? '

     शंख मुनि बोले - 'दण्ड देना राजा का काम है। दूसरा कोई दण्ड दे तो वो पाप होगा।  लेकिन कृपा करना तो सदा ही श्रेष्ठ है। इसलिये तुम्हारे ऊपर कृपा करके मैंने तुम्हारे हाथ ठीक कर दिये। '

 सीख - बिना पूछे किसी की कोई भी वास्तु लेना चोरी है, यह बात इस कहानी से समझ में आती है। और साथ में सजा देना राजा का काम है कोई और दे तो पाप हो जाता है। कृपा करना श्रेष्ठ है और हर कोई  ये कर सकता है। और ऐसा कृपा करने के लिए पहले बहुत तपस्या करना पड़ता है।