Thursday, June 26, 2014

Hindi Motivational Stories......................... शरणागत

शरणागत 

  भारत में एक ये भी प्रथा थी। जब कोई व्यक्ति मुसीबत के समय में वह  किसी राजा के शरण में जाता है तो राजा उस की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता और उस शरण आये व्यक्ति की रक्षा करता। ये उस समय की बात है जब दिल्ली के सिंहासन पर अलाउदीन बादशाह का राज था। और बादशाह का सब से प्रिया सरदार था मुहम्मदशाह। मुहम्मदशाह पर बादशाह की बड़ी कृपा थी और इसी से वह बादशाह का मुँहलगा हो गया था।

    एक दिन बातें करते समय हँसी में मुहम्मदशाह ने कोई ऐसी बात कह दी कि बादशाह क्रोध से लाल हो उठा। उसने मुहम्मदशाह को फाँसी पर चढ़ा देने की आज्ञा दे दी। बादशाह की आज्ञा सुनकर मुहम्मदशाह के तो प्राण सुख गये। किसी प्रकार मुहम्मदशाह दिल्ली से भाग निकला। अपने प्राण बचाने के लिये उसने अनेक राजाओं से प्रार्थना की, किन्तु किसी ने उसे शरण देना स्वीकार नहीं किया। बादशाह को अप्रसन्न करने का साहस किसी को नहीं हुआ। विपत्ति का मारा मुहम्मदशाह इधर-उधर भटक रहा था। अन्त में वह रणथम्भौर के चौहान राजा हमीर के राज-दरबार में गया। उसने राजा से अपने प्राण बचाने की प्रार्थना की। राजा ने कहा - 'राजपूत का पहला धर्म है शरणागत की रक्षा। आप मेरे यहाँ निश्चिन्त होकर रहो। जब तक मेरे शरीर में प्राण है, कोई आपका बाल भी बाँका नहीं कर सकता। '

    मुहम्मदशाह रणथम्भौर में रहने लगा। और कुछ ही दिनों में बादशाह अलाउदीन को इस का पता लगा तो उसने राजा हमीर के पास संदेश भेजा - 'मुहम्मदशाह मेरा भगोड़ा है। उसे फाँसी का दण्ड हुआ है। तुम उसे तुरंत मेरे पास भेज दो। ' राजा हमीर ने उत्तर भेजा - 'मुहम्मदशाह मेरी शरण आया है मैंने उसे रक्षा का वचन दिया है। मुझे चाहे सारे संसार से युद्ध करना पड़े, भय या लोभ में आकर मैं शरणागत  का त्याग नहीं करूँगा। '

   अलाउदीन को राजा का पत्र पढ़कर बहुत क्रोध आया। उसने इसे अपमान समझा। उसने उसी समय सेना को रणथम्भोर पर चढाई करने को कहा। छोटे छोटे दलों के समान पठानो की बड़ी भारी सेना चल पड़ी। रणथम्भोर के किले को उस सेना ने दस मील तक चारों ओर से घेर लिया। अलाउदीन ने राजा के पास फिर संदेश भेजा कि वह मुहम्मदशाह को भेज दे। बादशाह समझाता था कि राजा हमीर बादशाह की भारी सेना देखकर डर जाएगा, और मुहम्मदशाह को हवाले करेगा। किन्तु राजा हमीर ने स्पष्ट कह दिया - ' मैं किसी भी प्रकार शरणागत को नहीं दूँगा। '

   बस फिर क्या था ! युद्ध प्रारम्भ हो गया। बादशाह की सेना बहुत बड़ी थी, किन्तु राजपूत वीर तो मौत से भी दो -दो हाथ करने को तैयार थे। भयंकर युद्ध महीनों चलता रहा। दोनों ओर के हज़ारों वीर मारे गये। अंत में एक दिन मुहम्मदशाह ने स्वयं राजा हमीर से कहा - 'महाराज ! मेरे कारण आप बहुत दुःख उठा चुके। मुझ से अब आपके वीरों का नाश नहीं देखा जाता। मैं बादशाह के पास चला जाना चाहता हूँ। ' राजा हमीर बोले - ' मुहम्मदशाह ! तुम फिर ऐसी बात मत कहना। जब तक मेरे शरीर में प्राण है, तुम यहाँ से बादशाह के पास नहीं जा सकते। राजपूत का कर्तव्य है शरणागत-रक्षा। मैं अपने कर्तव्य का पालन प्राण देकर भी करूँगा।

   जैसे-जैसे समय बीतता गया, राजपूत सेना के वीर घटते गये। रणथम्भोर के किले में भोजन-सामग्री कम होने लगी। उधर अलाउदीन की सेना में दिल्ली से आकर नयी-नयी टुकड़ियां बढ़ती ही जाती थी। अंत में रणथम्भोर के  किले की सब भोजन-सामग्री समाप्त हो गयी। राजा हमीर ने ' जौहर-व्रत ' करने का निश्चय किया। राजपूत स्त्रिया जलती चिता में कूद गयी और केसरिया वस्त्र पहनकर सब राजपूत वीर किले का फाटक खोलकर निकल पड़े। शत्रुअों से लड़ते-लड़ते वे मारे गये। मुहम्मदशाह भी राजा हमीर के साथ ही युद्ध- भूमि में आया और युद्ध में मारा गया। विजय बादशाह अलाउदीन जब रणथम्भोर के किले में पहुँचा तो उसे केवल जलती चिता की राख और अंगारे मिले।

सीख - शरणगत की रक्षा के लिये अपने सर्वस्व का बलिदान करने वाले वीर महापुरुष संसार की इस पवित्र भारत-भूमि पर ही हुए है। शरणगत की रक्षा का ये सब से बड़ा उदहारण है। और आज के समय में सब को माया ने अपने जाल में फंसा लिया है। माया जाल से बचने के लिये हम सब अब ईश्वर की शरण लेना होगा। तब ही हम सुख शांति से जी पाएँगे।