Saturday, June 14, 2014

Hindi Motivational Stories......... ........सब से श्रेष्ठ धन, संतोष धन

सब से श्रेष्ठ धन, संतोष धन

      एक बार किसी नगर में अकाल पड़ गया। लोग भूखों मरने लगे। उस नगर के जमींदार ने नगर में यह कहलवा दिया कि मैं प्रतिदिन बच्चों को खाने के लिए रोटी बाटुँगा। हमारे यहाँ सभी बच्चे समय पर इकट्ठे हो जाये। सभी बच्चों के आने पर वह जमींदार अपने हाथों से दो-दो रोटी प्रत्येक बच्चे को देता था। किन्तु एक दस वर्ष की लड़की जो बड़ी ही भोली-भाली थी। एकान्त में खड़ी रहती, जब उसकी बारी आती तो अन्त में सब से छोटी रोटी ले लेती थी। अन्य सभी बच्चे उसे धक्का देकर बड़ी-बड़ी रोटियाँ ले लेते थे। प्रतिदिन इसी तरह से शान्त होकर सब से बाद में वह लड़की छोटी रोटी ख़ुशी-ख़ुशी लेकर घर पर अपनी माँ को देती थी। उधर माँ और बेटी के सिवाय और कोई भी नहीं था। दोनों रोटी खाकर भगवान का गुणगान करते हुए सुख, शान्ति से सो जाते थे। इसी प्रकार एक दिन वह लड़की रोटी लेकर घर आयी। माँ ने जब रोटी तोड़ी तो उसमें से सोने के तीन छोटे-छोटे दाने मिले। माँ ने कहा -बेटी इस रोटी में सोने के तीन छोटे-छोटे दाने है, ले जाकर जमींदार को दे आवो।

         लड़की ने कहा - अच्छा माँ, मैं अभी लेकर जाती हूँ। वह लड़की टूटे हुए रोटी में सोने के दाने रखकर जमींदार के पास पहुँची और कहने लगी - बाबू जी, यह लो अपने सोने के दाने। जमींदार के आश्चर्य का ठिकाना न रहा कि यह लड़की कैसे सोने के दाने देने के लिए आयी है ! जमींदार के पूछने पर उस लड़की ने सारा किस्सा कह सुनाया। जमींदार सब कुछ सुनने के बाद उस लड़की को अपलक नज़रों से देख रहा था। क्यों कि जमींदार जानता था, कि यह लड़की शान्त खड़ी होकर सब से अन्त में छोटी रोटी लेकर चली जाती थी।

    जमींदार ने कहा - बेटी, तुम इसे ले जावों। यह तुम्हारे सन्तोष का फल है। लड़की ने उत्तर दिया - बाबू जी, सन्तोष का फल तो मुझे पहले ही प्राप्त हो गया कि भीड़ में धक्के नहीं खाने पड़े। जमींदार यही सोचता था, कि बच्ची तो छोटी है, परन्तु बात बड़ी ही ऊँची और सयानी करती है। जमींदार के बहुत कहने-सुनने पर लड़की सोने के दाने को लेकर घर चली गयी। बाद में जमींदार ने खूब सोच समझकर उस लड़की एवं उसके माता को अपने घर बुलावा लिया। और उसे धर्म-पुत्री बनाकर समूचे सम्पतिका उत्तराधिकार सौंप दिया। क्यों कि सन्तान हीन होने के कारण जमींदार को वैसे भी सन्तान की आवशकता थी। कहने का भाव यह है कि स्थूल धन से श्रेष्ठ सन्तोष धन होता है। क्यों कि उस बच्ची को सन्तोष का फल कितना मीठा प्राप्त हुआ।

 सीख - एक कहावत है , "जब आवे सन्तोष धन सब धूरि सामान" कहने का भाव ये है की अगर हमारे जीवन में सन्तोष है तो सन्तोष सब से बड़ा धन है इस के आगे बाकी सब धन धूल के सामान है। इस लिए जो कुछ आपके पास है उस में सन्तोष अनुभव करे।