Tuesday, July 15, 2014

Hindi Motivational Stories.........................सर गुरुदास की मातृभक्ति

सर गुरुदास की मातृभक्ति 

     बहुत पुरानी बात है उस समय की है जब भारत में अंग्रेजो का राज्य था। बहुत थोड़े से भारतवासी उस समय ऊँचे सरकारी पदों पर नियुक्त हो सकते थे। सर गुरुदास की माँ बचपन में ही चल बसी, तब उनका पालन पोषण यहाँ तक की दूध भी धाय ने पिलाया और इस तरह गुरुदास बड़े हुए। बुढ़िया धाय को गुरुदास माता के रूप में ही देखते थे। कुछ समय के बाद धाय देहात में चली गई।

     समय के साथ बहुत बदलाव हुआ। गुरुदास कलकत्ता के हाईकोर्ट के न्याधीश (बड़े जज ) बन गए और साथ ही कलकत्ता-विश्वविद्यालय के वोइसचांसलर भी बने। एक बार सर गुरुदास हाईकोर्ट में बैठे कोई मुकदमा सुन रहे थे।उसी समय एक बुढ़िया वह आयी।बुढ़िया धाय बहुत समय से कलकत्ता नहीं आयी थी। एक दिन वह गंगा स्नान करने कलकत्ता आयी और गंगा स्नान के बाद उसे गुरुदास की याद आयी। उसने सोचा चलो गुरुदास से मिलते हुए जाऊँ। लोगो से पूछती -पूछती वह हाईकोर्ट के पास आ गयी।

     देहात की एक गरीब बुढ़िया मैले कपड़े पहने आयी थी। गंगा स्नान करने से उसके कपडे भीगे थे। उसने सूखे कपडे भी नहीं पहने थे। हाईकोर्ट का चपरासी उसे कमरे के भीतर नहीं जाने दे रहा था, और वह उससे हाथ जोड़कर कह रही थी - 'भैया ! मुझे अपने गुरुदास से मिल लेने दो। " अचानक सर गुरुदास की दॄष्टि दरवाज़े की ओर चली गयी।

       वे न्याधीश के आसन से झटपट खड़े हो गये। उनको आते देखकर चपरासी एक ओर हट गया। सर गुरुदास ने भूमि में लेटकर उस मैली-कुचैली गरीब बुढ़िया को दण्डवत-प्रणाम किया। सब लोग हक्के-बक्के-से देखते रह गये। देहाती बुढ़िया क्या जाने कि हाईकोर्ट क्या होता है और जज क्या होता है। उसकी तो दोनों आँखों से आँसू की धारा चलने लगी। उसने कहा - " मेरा गुरुदास ! जीता रह बेटा। "

   सर गुरुदास ने सब को बताया - " ये मेरी माता है। इन्होने मुझे दूध पिलाया है। अब आज मुकदमा बन्द रहेगा। मैं इन्हें लेकर घर जा रहा हूँ। " उस बुढ़िया को जस्टिस सर गुरुदास आदर पूर्वक अपने घर ले गये। वहाँ उन्होंने उसका खूब आदर-सत्कार किया। दूध पिलाने वाली धाय भी माता ही है। जो इतने बड़े जज होकर धाय का भी इतना आदर करते थे, वे अपनी माता स्वर्णमणि देवी का कितना आदर करते होंगे।

सीख - जो लोग पढ़-लिखकर और ऊँचे पद पाकर अपने माता-पिता तथा घर-गाँव के बड़े लोगों का आदर नहीं करते, वे तो ओछे स्वाभाव के कहे जाते है। अच्छे पुरुष वही है, जो पद, विधा और बड़ाई पाकर भी अभिमान नहीं करते। वे सदा नम्र बने रहते है और अपने से बड़ों का पूरा आदर करते है।