Monday, September 29, 2014

Hindi Motivational Stories.....................................आदर्श माँ

आदर्श माँ 


                        एक गाँव की सच्ची घटना है। उस गाँव में हिन्दु और मुसलीम दोनों रहते थे। मुसलमान के एक घर बालक हुआ, पर बालक की माँ मर गयी। वह बेचारा बड़ा दुःखी हुआ। एक तो स्त्री के मरने का दुःख और दूसरा नन्हे-से बालक को पालन कैसे करुँ- इसका दुःख। उसके पास में ही हिन्दू रहता था। उसका भी दो - चार दिन का ही बालक था। उसकी स्त्री को पता लगा तो उसने अपने पति से कहा उस बालक को ले आओ, मैं पालन करुँगी। अहीर उस मुसलमान के बालक को ले आया। अहीर की स्त्री ने दोनों बालको का पालन किया। उनको अपना दूध पिलाती, स्नेह से रखती, प्यार करती। उसके मन में बेदभाव नहीं था कि ये मेरा बालक है और ये दूसरे का बालक है।

    जब बालक बड़ा हुआ पढने लिखने  लायक हो गया तो स्त्री ने उस मुसलमान को बुलाकर कहा कि अब तुम अपने बच्चे को ले जाओ और पढ़ाओ- लिखाओ, जैसी मर्जी आये वैसे बनाओ। मुसलमान ने बच्चे को पढ़ाया -लिखाया और बच्चा भी पढ़-लिखकर एक हॉस्पिटल में नौकरी भी करने लगा। कुछ सालों के बाद अहिरे की स्त्री को छाती में बहुत पीड़ा महसूस हुआ तो उसे उसी हॉस्पिटल में भर्ती किया। डॉक्टर ने कहा खून की कमी है अगर उन्हें खून चढ़ाया जाय तो यह ठीक हो जायेगी। खून कौन दे ? परीक्षा की गयी। मुसलमान का वह लड़का जो वहाँ काम करता था। देवयोग से उसका खून मिल गया। उस माईने तो उसको पहचाना नहीं पर उस लड़के ने उसे पहचान लिया हाँ येही मेरी पालन करने वाली माँ है। बचपन में इसका ही दूध पीकर मैं  बड़ा हुआ, इसी कारण खून में एकता आ गयी। डॉक्टर ने कहा इसका खून चढ़ाया जा सकता है। उस से पूछा गया क्या तुम अपना खून दे सकते हो ? लड़के ने कहा हाँ मैं खून तो दे दूँगा पर मैं दो सौ रुपये लूँगा। अहिरे ने उसको दो सौ रुपये दे दिये। खून माईको चढ़ा दिया गया और उसका शरीर ठीक हो गया और वह अपने घर चली गयी।

      कुछ दिनों बाद वह लड़का अहिरे के घर गया और माँ के चरणो में हज़ार-दो-हज़ार रुपये रखकर कहा ' आप ही मेरी माँ है मैं आपका ही बच्चा हूँ। आपका ही दूध पीकर मैं बड़ा हुआ हूँ। ये रुपये आप ले ले। उसने लेने से माना करने पर लडके ने हॉस्पिटल की बात याद दिलायी। कि खून के दो सौ रुपये इसलिये लिए थे कि मुफ़्त में आप खून न लेती और खून न लेने से आपका बचाव नहीं होता। यह खून तो वास्तव में आपका ही है। ये शरीर भी आपका है। मेरे रुपये शुद्ध कमाई के है। आपकी कृपा से मैं लहसुन और प्याज भी नहीं खता हूँ। अपवित्र , गन्दी चीजें मेरी अरुचि हो गयी है। अंतः ये रुपये आपको लेने ही पड़ेंगे।  ऐसा कहकर उसने रुपये से दिये।

   अहिरे की स्त्री बड़े शुद्ध भावना वाली थी, जिस से उसके दूध का असर ऐसा हुआ कि वह लड़का मुसलमान होते हुए भी अपवित्र चीज नहीं खाता था।

सीख - हम सब का पालन माता, बहनो ने ही किया पर उनका गुणगान नहीं करते लेकिन अहिरे की स्त्री का करते है, क्यों कि अपने बच्चे का तो हर कोई पालन करते है। जानवर भी अपने बच्चे की सम्भल करता है। लेकिन दूसरे के बच्चे को अपने बच्चे जैसा समझ पालन कर फिर उन्हें सौप देना ये बड़ी बात है और उसका असर बच्चे पर कितना प्रभावशाली रहा ये हमने सुना। इसलिए अहिरे की स्त्री का हम आप गुणगान करते है।