Saturday, September 6, 2014

Hindi Motivational Stories....................अनोखा अतिथि-सत्कार

अनोखा अतिथि-सत्कार 

    बहुत पुरानी बात है। त्रिपुरा में एक ब्राह्मण रहता था। भक्ति भाव से भरे अतिथि की सेवा को अपना धर्म मानते थे। जैसे तैसे उनकी शादी हुई। स्त्री भी स्वभाव से अच्छी थी, गुणवान और पति की आज्ञा को अपना धर्म मानने वाली थी। ब्राह्मण ने पहले दिन ही अपनी स्त्री से कह दिया कि देखो, अब मैं गृहस्थ बन गया हूँ। हमारा धर्म है अतिथि-सत्कार करना। मैं घर में राहु या न राहु कोई अतिथि आये तो भूखा मत जाने देना। ब्रम्हचारी का  गुरु- आज्ञा का पालन करना। वानप्रस्थ का तप करना और भक्ति - भजन करना। उनकी स्त्री ने कहा -"अच्छी बात है "  ब्रह्मण त्रिपुरा नगरी में घूमते फिरते भिक्षा माँगते और जो भी मिले उसे लाकर स्त्री को देते। घर की स्थिति बहुत साधारण थी। खाने के लिये अन्न भी नहीं था। भिक्षा मिले तो खाये नहीं मिले तो भूखे ही सो जाते थे।

     ईश्वर की लीला भी निराली है। एक दिन एक बूढ़ा संन्यासी आया और आवाज़ लगाया घर में कोई है ? ब्राह्मण बाहर आया। बूढ़ा संन्यासी ने कहा ," आज सोचा आपके यहाँ भोजन करू। ब्राह्मण ने कहा ,' ये तो अच्छी बात है। बहुत ही आनन्द की बात है। आओ अन्दर आओ ' कहते हुवे संन्यासी को घर में बिठाया। और देवयोग से उस दिन बाह्मण को कही से भिक्षा नहीं मिली थी। और घर में कुछ था नहीं। ब्राह्मण अपनी स्त्री से कहा घर में कुछ है। स्त्री बोली हाँ। ब्राह्मण बोला तुम्हारे माया के कुछ गहनें मिले है क्या? स्त्री बोली नहीं एक काम करो आप जल्दी दर्जी से कतरनी (कैंची) ले आऒ। ब्राह्मण गया और कतरनी ले आया। स्त्री कतरनी से अपने सिर के कुछ बाल काट दिए और उसका रस्सी बनाकर ब्राह्मण को दे दिया बोला इसे बाज़ार में बेच आओ। ब्राह्मण गया और उसे बेचकर जो पैसे मिले उसका दाल और चावल लेकर आया। स्त्री ने भोजन बनाया।

     ब्राह्मण ने महाराज से कहा रसोई तैयार है। भोजन कर ले , महाराज ने पूरा खाना खा लिए एक दाना भी नहीं छोड़ा। और कहा ब्राह्मण से ,'अब मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ इतनी धुप में चल नहीं सकता। इसलिये आज यही रुख जाता हूँ।' ब्राह्मण बोला- ' अच्छी बात आज यही रहो  महाराज !' दुपहर का काम तो निपट गया और फिर रात के लिए क्या करे ? ये सवाल ब्राह्मण के मन में आया। श्याम हुई ब्राह्मण स्त्री से पूछा अब क्या करे स्त्री ने फिर से अपने बचे हूवे बाल भी काट कर उसका रस्सी बनाया और ब्राह्मण को दिया और ब्राह्मण फिर से उसे बेच कर कुछ दाल चावल लेकर आया। महाराज ने ब्राह्मण से कहा ,'रात में सिर्फ दाल चावल मिल जाय तो बहुत है और कुछ नहीं चाहिये।' ब्राह्मण ने कहा 'जी महाराज !' रात में महाराज भोजन करने बैठे महाराज को भोजन केले के पत्ते से दिया गया। महाराज थोड़ा और थोड़ा और करते करते सारा खाना खत्म कर दिया एक दाना भी नहीं छोड़ा। और कहा -'आज मैं तृप्त हो गया हूँ।' ....

      रात बहुत हो गयी थी। महाराज ने कहा अब मैं कहाँ जाऊ आज रात यही ठहर जाता हूँ। ब्राह्मण बोला हां महाराज!  चटाई एक ही थी। उसे महाराज के लिए बिछा दिया , महाराज उस पर विराजमान हो गये आराम से सो गये। ब्राह्मण और स्त्री दोनों भूखे ही थे और खाना कुछ बचा भी नहीं था जो खाए।  ब्राह्मण महाराज के पास बैठकर उनके पैर दबाने लगे और स्त्री दूसरी तरफ बैठी थी थोड़ी देर में महाराज सो गये। और फिर ब्राह्मण भी सो गया महाराज के पैरो की तरफ और स्त्री सो गयी सिर के पास। महाराज मध्य रात्री को जग गये दोनों को बहुत आशीर्वाद दिया और कहा तुम्हरे सिर के बाल आ जाये कपडे नए हो , घर अच्छा हो। … आपके यहाँ अतिथि-सत्कार खूब हो आनन्द मंगल हो। … ये कहकर महाराज अंतर्दृश्य हो गए। . . सच बात तो ये था, महाराज के रूप में खुद भगवान उनके यहाँ  आये थे।

       सुबह ब्राह्मण ने देखा महाराज नहीं है तो यहाँ वहाँ उन्हें खोजने लगे। स्त्री भी जग गयी तो देखा उसके बाल वैसे के वैसे है। कपडे नये है घर सुन्दर बन गया है। ब्राह्मण स्त्री से पूछने लगा महाराज बूढ़े थे कैसे गये होंगे कहाँ गये होंगे कुछ पता है ? स्त्री बोली आप अपने आप को देखो घर को देखो।  वे महाराज नहीं स्वम् भगवान हमारे यहाँ पधार कर आशीर्वाद देकर अदृश्य हो गये है। ब्राह्मण रोने लगा आप आये हमने आप का सत्कार उतना नहीं कर पाये जितना करना चाहिये था। हम अनजान थे महाराज ! हमें क्षमा करो प्रभु !! इसी बीच उन्हें एक आवाज़ सुनायी दिया। " हे ब्राह्मण तुम्हारी सेवा से मैं प्रसन्न हूँ अब तुम इसी तरह अतिथि -सेवा करना सेवा करते करते तुम मेरे धाम आ जाएंगे । "

सीख - भारत में अतिथि-सत्कार को पुण्य कर्म कहा गया है। जिसका फल अनेक जन्म तक मिलता है। इसलिये अतिथि-देवो भव कहा गया है।