Friday, July 11, 2014

Hindi Motivational Stories..........................दो आदर्श मित्र

दो आदर्श मित्र

  बहुत सालों पुरानी ये बात है। इंगलैंड के एक छोटे शहर में मिनिस्टर नाम के एक प्रसिद्ध स्कूल में दो मित्र पढ़ते थे। एक का नाम था निकोलस और दूसरे का नाम था बेक। इन दो की विशेषता अलग-अलग थी। निकोलस आलसी, नटखट और झूठा था। परन्तु बेक परिश्रमी, सीधा और सच्चा लड़का था। इतना होने पर भी बेक और निकोलस में बहुत पक्की मित्रता थी।

    एक दिन पाठशाला के टीचर किसी काम से थोड़ी देर के लिये कक्षा से बाहर चले गये। लड़कों ने पढ़ना बन्द कर दिया और वे बातचीत करने लगे। नटखट निकोलस को धूम करने की सूझी। उसने कक्षा में लगा दर्पण उठाकर पटक दिया। दर्पण चूर-चूर हो गया। दर्पण के टूटते ही सब लड़के चौक गये। पूरा सन्नाटा छा गया। और तब निकोलस को भी लगा कि उस से बहुत बड़ी भूल हुई। मार पड़ने के भय से वह अपने स्थान पर जाकर चुपचाप बैठ गया और सिर झुकाकर पढ़ने में लग गया।

       शिक्षक ने कक्षा में आते ही दर्पण के टुकड़े देखे। वे बहुत कठोर स्वाभाव के थे। बड़े क्रोध से डाँट कर उन्होंने कहा - 'यह उत्पात किसने किया है ? वह अपने स्थान पर खड़ा हो जाय। ' अब भयके मारे कोई लड़का बोला नहीं। लेकिन शिक्षक यु सहज छोड़ देने वाले नहीं थे। उन्होंने एक - एक लडके को खडा करके पूछना शुरू किया। जब निकोलस की बारी आयी तो दूसरे लड़कों के समान उसने भी कह दिया - ' मैंने दर्पण नहीं तोड़ा। '

     बेक ने जब देखा कि उसका मित्र निकोलस मार पड़ने के डर से झूठ बोल गया है तो उसने सोचा कि 'शिक्षक अवश्य दर्पण तोड़नेवाले का पता लगा लेंगे। और निकोलस को झूठ बोलने के कारण और भी ज्यादा मार पड़ेगी। इसलिये मुझे अपने मित्र को बचा लेना चाहिये। ' वह उठकर खड़ा गया और बोला- दर्पण मेरे हाथ से टूट गया है। अब सब लडके और निकोलस भी आश्चर्य से बेक का मुख देखने लगे। शिक्षक ने बेत उठा लिया और बेक को पीटने लगे। बेचारे बेक के शरीर पर नीले- नीले दाग पड़ गये, किन्तु न तो वह रोया और न ही चिल्लाया।

   जब पाठशाला की छुट्टी हुई, सब लड़कों ने बेक को घेर लिया। निकोलस रोता-रोता उसके पास आया और बोला - "बेक ! मैं तुम्हारे इस उपकार को कभी नहीं भूलूँगा। तुमने मुझे आज मनुष्य बना दिया। मैं अब कभी झूठ नहीं बोलूँगा, ऊधम नहीं करूँगा। अब मैं पढ़ने में ही परिश्रम करूँगा। "  निकोलस सचमुच उसी दिन से सुधर गया। वह पढ़ने में परिश्रम करने लगा। बड़ा होने पर उसने इतनी उन्नति की कि वह न्याधीश के पद पर पहुँच गया।