Thursday, September 11, 2014

Hindi Motivational Stories.......................................विलक्षण साधना

विलक्षण साधना


    रामायण में इस बात का ज़िक्र है। शबरी भगवान राम की परम भक्त थी। वा पहले ' शाबर ' जाति की एक भोली- भाली लड़की थी। शाबर जाति के लोग कुरूप होते थे। परन्तु शबरी इतनी कुरूप थी कि शाबर-जाति के लोग भी उसको स्वीकार नहीं करते थे। माँ-बाप को बड़ी चिन्ता होने लगी कि लड़की का विवाह कहाँ करे। ढूंढ़ते- ढूंढ़ते आखिर  उनको शाबर-जाति का एक लड़का मिला। माँ-बाप ने रात में ही शबरी का विवाह कर दिया और लडके को कहा कि भैया, तुम अपनी स्त्री को रातो  तो रात ले जाना। लड़का मान गया और वह अपनी स्त्री शबरी को लेकर चल दिया। आगे-आगे लड़का चल रहा था पीछे शबरी चल रही थी। चलते-चलते वे दण्डक वन में आ पहुँचे। वहाँ सूर्योदय हुआ। तो लडके के मन में आया अपनी स्त्री को देखूँ तो सही, मेरी स्त्री कैसी है। लडके ने पीछे मुड़कर शबरी को देखा तो उसकी कुरूपता देखकर वह डर के मारे वहाँ से भाग गया कि यह तो कोई डाकण है, मेरे को खा जायेगी ! अब शबरी बेचारी दण्डकवन में अकेली रह गयी। वह पीहर से तो आ गयी और ससुराल का पता नहीं। अब वह कहाँ जाय !

   दण्डकवन में रहनेवाले ऋषि शबरी को अछूत मानकर उसका तिरस्कार करने लगे। वहाँ "मतंग " नाम के एक वृद्ध ऋषि रहते थे, उन्होंने शबरी को देखा तो उस पर दया आ गयी। उन्होंने शबरी को अपने आश्रम में शरण दे दी। दूसरे ऋषियों ने विरोध किया कि अपने एक अछूत जाति की स्त्री को शरण दी है। मतंग ऋषि उनकी बात नहीं सुनी और शबरी को अपने बेटी की तरह अपने पास रखा। और शबरी उनकी सेवा बहुत दिल से करती। आश्रम के सब लोग जब सो जाते थे, तब शबरी आश्रम की साफ सफाई करती और ऋषि जहाँ से आना जाना करता उस रास्ते को फूलो से सजा देती। उनके लिए पानी लाकर रखना। सब ऋषि मुनि शबरी का तिरस्कार किया करते थे, इसलिए वह छिपकर, डरते - डरते उनकी सेवा करती थी। वह डरती थी कही मेरा साया ऋषियो पर पड़े तो वे अशुद्ध हो जायेंगे। आखिर एक दिन वह समय आ पहुँचा, जो सब के लिए अनिवार्य है ! मतंग ऋषि का शरीर छूटने का समय आ गया। जैसे माँ-बाप के मरते समय बालक रोता है, ऐसे शबरी भी रोने लग गयी ! मतंग ऋषि ने कहा कि बेटा ! तुम चिन्ता मत करो। एक दिन तेरे पास भगवान राम आयेंगे ! मतंग ऋषि शरीर छोड़कर चले गये।

   अब शबरी भगवान राम के आने की प्रतीक्षा करने लगी ! प्रतीक्षा बहुत ऊँची साधना है। इस में भगवान का विशेष चिन्तन होता है। भगवान का भजन-ध्यान करते है तो वह इतना सजीव साधना नहीं होता, निर्जीव-सा होता है। परन्तु प्रतीक्षा में सजीव साधना होती है। रात में किसी जानवर के चलने से पत्तों की खड़खड़ाहट भी होती तो शबरी बाहर आकर देखती कि कहीं राम तो नहीं आ गये। वह प्रतिदिन कुटिया के बाहर पुष्प बिछाती और तरह-तरह के फल लाकर रखती। फलों में भी चखकर बढ़िया-बढ़िया फल रामजी के लिये रखती। रामजी नहीं आते तो दूसरे दिन फिर ताजे फल लाकर रखती। उसके मन में बड़ा उत्साह था कि रामजी आयेंगे तो उनको भोजन कराऊंगी।

  प्रतीक्षा करते करते एक दिन शबरी की साधना पूर्ण हो गयी ! मुनि के वचन सत्य हो गये। भगवान राम शबरी की कुटिया में पधारे -  दूसरे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि प्रार्थना करते है कि महाराज ! हमारी कुटिया में पधारों। पर भगवान कहते है कि नहीं, हम तो शबरी की कुटिया में जायेंगे।

  जैसे शबरी के ह्रदय में भगवान से मिलने की उत्कण्ठा लगी है, ऐसे ही भगवान के मन में शबरी से मिलने की उत्कण्ठा लगी है ! भगवान का स्वभाव है कि जो उनको जैसे भजता है, वे भी उसको वैसे ही भजते है - "ये यथा माँ प्रपधन्ते तास्तथेव भजाम्यहम् " ( गीता ४ /११ )

  शबरी के आनन्द की सीमा नहीं रही ! वह भगवान के चरणों में लिपट गयी।  जल लाकर उसने भगवान के चरण धोये।  फिर आसन बिछाकर उनको बिठाया। फल लाकर भगवान के सामने रखे और प्रेमपूर्वक उनको खिलाने लगी। शबरी पुराने ज़माने की लम्बी स्त्री थी। रामजी बालक की तरह छोटे बन गये। और जैसे माँ बालक को भोजन कराये, ऐसे शबरी प्यार से राम जी को फल खिलाने लगी और रामजी भी बड़े प्यार से उनको खाने लगे।

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहूँ आनि। 
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि। ।