Thursday, January 29, 2026

*शीर्षक –तालाब में अब पानी नहीं है।*



1– तैरने आता है मगर तालाब में पानी नहीं है।

ननिहाल में अब वो प्यार नहीं मिलता क्योंकि नानी नहीं है।

किसी भी बाग में अब वो रौनक नहीं मिलती।

क्योंकि अब वह निगरानी नहीं है।

मैं आज भी उसी उमंग उत्साह से उड़ना चाहता हूं।

मगर अब वह रवानी नहीं है।

तैरना आता है मगर तालाब में पानी नहीं है।


2–ये इंसा बहुत दूर तक सोचता है।

मगर सोंच की कुछ निशानी नहीं है।

परिंदे के जैसे लौट आओ घर को

यहां कोई अपनी कहानी नहीं है।

ज्यादा उड़ोगे तो कट जाएंगे पर

ऊपर वाले की मेहरबानी नहीं है।

रहो नम्र इतना की पहचान आओ

यह रिश्ता कोई खानदानी नहीं है।

तैरना आता है मगर तालाब में अब पानी नहीं है ।


3–ज्यादा कहूंगा तो तुम ही खाओगे।

बहुत बोलता है जुबानी नहीं है।

ऊपर देखता हूं धुआं ही धुआं है।

गगन भी अब वो आसमानी नहीं है।

थे जितने कुएं गांव में जाकर देखो

किसी में अब पीने का पानी नहीं है।

चमक और दमक कुछ ही पल की है बाबू

यह रिश्ता कोई अब रूहानी नहीं है।

तैरना आता है मगर तालाब में पानी नहीं है।

ननिहाल में अब वह प्यार नहीं मिलता क्योंकि अपनी नानी नहीं है।


*ओम शांति** 

रचनाकार *–सुरेश चंद्र केशरवानी* 

(प्रयागराज शंकरगढ़)

मोबाइल नंबर –9919245170