Tuesday, May 6, 2014

Hindi Motivational Stories - " सकारात्मक दॄष्टिकोण "

सकारात्मक  दॄष्टिकोण 

  एक प्रसिद्ध जूता बनाने वाली कम्पनी ने एशिया खण्ड में मॉल्स की श्रृंख़ला खोलने का विचार किया। सफलता सुनिश्चित करने के लिये कम्पनी प्रबंधन ने एशिया खण्ड के बाजार का गहन सर्वेक्षण करवाया। पहला सर्वेक्षण टीम के परिणाम, कुछ इस प्रकार मिले -  देश के मूल निवासी असभ्य, बबर्र और जंगली है , जो जानवरों के चमड़े और पेड़ो के पत्तों से बने कपड़े और टोपी भी केवल ठंड और बरसात में ही पहनते है। ऐसे में जब कि कपडे भी उनके लिए अनावश्यक है तब वहाँ जूते बेचना मूर्खता है। अब कम्पनी के अध्यक्ष ने इस रिपोर्ट को एक तरफ किया और उसी सर्वेक्षण के लिए दूसरी टीम को फिर भेजा। नई टीम ने लिखा - सड़कों के अभाव तथा यातायात के साधनों की कमी के कारण जूते इस देश के नागरिकों के लिए वरदान सिद्ध हो सकते है। स्थानीय लोगों और चिकित्सकों के संदर्भ से यह जानकारी मिली है कि स्थानीय लोगों को सब से ज्यादा चोट पैरों में लगती है अंतः जूतो के व्यापार में सफलता संभव है। अध्यक्ष ने इस नई रिपोर्ट पर पूरा ध्यान दिया और वहाँ तत्काल काम शुरू किया। और सफलता पाया। 

सीख - एक छोटी सी बात बताती है कि दॄष्टिकोण  का परिणाम पर कितना असर पड़ता है। इस लिए हमेशा अपनी सोच को नज़र को सकारत्मक रखे। यही सफलता का राज है। 

Hindi Motivational Stories - " शंका दुःख का कारण "

शंका दुःख का कारण

     मेरे दोस्तों हम सब जीवन जीते है हमारा खाना पहनावा लग भग एक जैसा ही है १९ /२० का फरक वो एक अलग बात है। जीवन में सुख सब चाहते है और इस सुख के लिये हम वस्तु वैभव और दूसरों से अपेक्षाएँ करते है पर फिर भी सुख पाने की आशा बानी ही रहती है। और एक सुखमय सन्सार दुःख में कैसे बदलता है इस के लिए एक छोटी कहानी के दवरा समझेंगे।

          एक बहुत ही प्यारा परिवार था, राम और श्याम दो सागे भाई थे। दोनों का आपस में बहुत प्यार था,  दोनों की पत्नियाँ भी सुशील और संस्कारी थी। गृहस्थी बड़े सुन्दर ढंग से चल रही थी। राम यदि कोई भी वस्तु अपनी पत्नी के लिए लाता तो ठीक वैसे ही श्याम की पत्नी के लिए भी लाता था। खुद के लिए कोई  वस्तु  लाता तो ठीक वैसी ही अपने छोटे भाई के लिए भी ले आता था। अब एक बार राम एक जैसी दो साड़ीयाँ लाया। उसने अपनी पत्नी से कहा - पहले छोटी बहु को पसन्द की साड़ी दे देना, बची हुई तुम रख लेना। पत्नी ने वैसा ही किया।

        एक किसी प्रसंग पर दोनों ने वे साड़ीयाँ पहनी थी। अब हुआ ऐसा की राम की पत्नी की साड़ी की अन्य महिलाओं ने तारीफ की जब कि श्याम की पत्नी की साड़ी का सिर्फ रंग ही अलग था पर किसी ने भी उसकी तारीफ नहीं की। बस, शंका का जन्म हो गया कि जान-बूझकर मेरे जेठ ने अलग रंग की साड़ीयाँ खरीदी है। दोनों भाईयों में जो आज तक अपूर्व विश्वास था , सिर्फ एक छोटी-सी शंका ने ऐसा कहर ढा दिया कि उनकी गृहस्थी पूर्णतः नर्क में परिवर्तित हो गयी। दोनों परिवार साथ रहते थे पर शंका के कारण दोनों अलग अलग परिवार में रहने लगे।

सीख - दोस्तों इस कहानी से एक बात हम सीख सकते है चाहे कुछ भी हो शंका को दूर ही रहने देना चाहिए। क्यों की शंका ही दुःख का मुख्या कारण है। 

Hindi Motivational Stories - 'ट्रस्टीपन'

'ट्रस्टीपन' 

              एक राजा वर्षो तक सुखपूर्वक राज्य करता रहा लेकिन कुछ समय बाद देश में समस्याये बढ़ गयी तो उसकी चिंता भी बढ़ने लगी। उसे न भूख लगती, न नींद आती। वह बहुत परेशान रहने लगा। घबराकर वह अपने गुरु के पास गया, बोला - गुरुदेव, राज - काज में मन नहीं लगता, राज्य में परेशानियाँ बढ़ गयी है, इच्छा होती है, राज - काज छोड़कर कहीं चला जाऊँ। गुरु अनुभवी था, उसने कहा - राज्य का भार पुत्र को सौंप दो और आप निश्चिंत रहो। राजा ने कहा, पुत्र अभी छोटा है। फिर गुरु ने कहा - अपना राज्य मुझे सौंप दो। राजा खुश हो गया। उसने पूरा राज्य गुरु को सौंप दिया और स्वयं वहाँ से जाने लगा। गुरु ने पूछा - कहाँ जा रहे हो ? राजा ने उत्तर दिया - किसी दूसरे देश में जाकर धंधा करूँगा। गुरु ने कहा - इसके लिए धन कहाँ से आयेगा ? राजा ने कहा - खज़ाने में से ले जाऊँगा।

             गुरु ने कहा, खज़ाना आपका है क्या ? वह तो आपने मुझे सौंप दिया। राजा ने कहा - गुरुदेव गलती हो गयी, मैं यहाँ से कुछ नहीं ले जाऊँगा। बाहर जाकर किसी के पास नौकरी कर लूँगा। तब गुरु ने कहा - नौकरी ही करना है तो मेरे पास ही कर लो। राजा ने पूछा - काम क्या करना होगा ? गुरु ने कहा - जो मैं कहूँ, वही करना होगा। राजा ने गुरु का आदेश स्वीकार कर लिया और उसके यहाँ नौकर हो गया। गुरु ने उसको राज्य की सम्भाल का पूरा काम दे दिया। जो काम राजा पहले करता था वही पुनः उसके हिस्से में आ गया। अन्तर सिर्फ यह रहा कि अब वह राज - कार्य भार नहीं रहा बल्कि निमित्त भाव से कार्य किया जाने लगा। अब उसे भूख भी लगाने लगी, नींद भी आने लगी। कोई भी समस्या नहीं रही।

          एक सप्ताह बाद गुरु ने राजा को बुलाकर पूछा - अब क्या हाल है। राजा ने कहा - आपका उपकार कभी नहीं भूलूँगा। अब मैं परमानंद में हूँ। वही स्थान, वही कार्य पहले बोझ लगता था, अब खेल लगता है, तनाव दूर हो गया और जिम्मेदारी का बोझ उत्तर गया है।

सीख - ये सन्सार ईश्वर की रचना है और हम उस रचयता के रचना याने बच्चे हो गये।  भगवान हमारा पिता है। इस लिये भगवान भी कहते है बच्चे, आपके पास जो भी कुछ है , उसमें से मेरा-पन निकाल कर, उसे ईश्वर की अमानत मानकर, श्रीमत प्रमाण सेवा में लगाओ तो आप भी हल्के हो जायेंगे। बोझ सम्बन्धो और वस्तुओ का नहीं होता है। मेरे पन में होता है। अंतः मेरे- पन को तेरे - पन में बदल दो। 'मेरा' के स्थान पर 'तेरा ' कर दो। मेरा नहीं 'ईशवर का ' यह महावाक्य जीवन का आदर्श बना लो।  

Hindi Motivational Stories - " इच्छाओ को जीतो "

इच्छाओ को जीतो 

                 सिकन्दर जब भारत में आया तो उसने एक योगी की दिल से सेवा की। योगी के दिल में आया कि सिकन्दर को जरूर कोई इच्छा है जिसके कारण यह मेरी इतनी सेवा कर रहा है। उसने राजा सिकन्दर से पूछा - आप क्या चाहते है ? राजा ने कहा - मेरा सारे विश्व पर राज्य हो जाये। योगी ने कहा - तथास्तु , लेकिन मेरी एक शर्त है , यह एक खप्पर है इसे आप अनाज से भर देना। सिकन्दर ने कहा - महाराज जी , आप अनाज की बात कर रहे है, मैं तो इसे हीरों से भर दूँगा। तभी उसने सैनिकों से हीरे मँगवाये और लगा भरने। बहुत देर हो गई भरते - भरते लेकिन खप्पर भरने को ही नहीं आया। सिकन्दर थक गया। योगी ने कहा - यह खप्पर मानव की इच्छाओं का प्रतिक है , यह कभी नहीं भरता। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी आ जाती है, दूसरी पूरी होती है तो तीसरी आ जाती है। इस तरह मानव की इच्छाये कभी पूरी नहीं होती है। आज आप विश्व पर राज्य करना चाह रहे है फिर आकाश पर और अन्य ग्रहों पर राज्य करना चाहेंगे। इस तरह सारे विश्व पर राज्य प्राप्त करने के बाद आपकी इच्छाये शान्त होने के बजाये और बढ़ेगी। 

सीख - ' इच्छा मात्रम अविद्या ' जो व्यक्ति अपने इच्छाओं को समझ ले और उन पर विजय बने तो वह बिना कुछ पुरषर्थ के भी सुखमय जीवन जी सकता है। किसी ने ये कहा है की मनुष्य अपने इच्छाओं को कम कर दे तो वो सुखी बन जाएगा। 

Monday, May 5, 2014

Hindi Motivational Stories - ' तृष्णा दुःख का कारण '

' तृष्णा दुःख का कारण '

    एक गरीब कलाकार की कला पर प्रसन्न होकर राजा ने उसे अशर्फियों से भरें (८ १/२ ) साढ़े आठ घड़े इनाम में दे दिया। कलाकार  के मन में प्रसन्नता तो हुई पर साथ ही एक चाह - सी उठी कि नवाँ घड़ा आधी खाली है, भर जाए तो कितना अच्छा हो। इस विचार ने उसे बेचैन कर दिया और वहा मारा- मारा फिरने लगा कि कहीं से आधा घड़ा अशर्फियाँ मिले। भरे हुए 8 घड़े उतना सुख नहीं दे पाए जितना दुःख उसे आधे खाली घड़े को देख कर उत्पन्न हो गया। इसलिए कहा जाता - बढ़ता है लोभ अधिक धन के संचय से जब तक एक भी घड़ा नहीं था तो चैन से सोता था, इतने मिल गए तो चैन छीन गया। वाह रे इन्सान, तेरी कैसी प्रवृति है ?

सीख - एक कहावत सुनी होगी आपने  ' आप होत बूढ़े पर तृष्णा होत जवान ' इन्सान के पास जीतना है और जितना मिलता है उसी में आनन्द उठावे यही जीवन का राज है। ये एक सच्ची कला जीवन जीने का जिस में ये कला है वाही इस सृष्टि रुपी नाटक का सच्चा कलाकार है।

Sunday, May 4, 2014

Hindi Motivational Stories - एकता से सफलता

" एकता से सफलता "

   एक गरीब परिवार था पर सभी सदस्यो में आपसी एकता बहुत थी। सो एक दिन वे सभी कमाने के लिए निकले बहुत दूर जाने पर एक पेड़ की छाया में बैठ गए। अब भूख भी बहुत लगी थी सो सभी भोजन का सामान जुटाने लगे। पिता ने बड़े पुत्र से कहा - जाओ, कुछ लकड़ियाँ ले आओ। यह सुन छोटा बेटा बोल पड़ा - इन्हें मत भेजो, मैं ले आता हूँ। पिता ने कहा - सभी एक - एक कार्य करो। एक लकड़ी लाए, दूसरा पानी, तीसरा पत्थर लाकर चूल्ह बनाए। देखते देखते सब तैयारी हो गई। वृक्ष पर बैठा एक देवदूत यह सब देख रहा था। और सोचा इनके पास तो खाना बनाने के लिए समग्री तो नहीं है बस लकड़ी पानो चूल्ह से क्या करेंगे। तब उसने हँसकर पूछा - पकाओगे क्या ? खाओगे क्या ? बड़े लड़के ने ऊपर देवदूत को देखा तो कहा - तुम जो हो। ये बात सुनते ही देवदूत के मन में आया इन्होंने मुझ पर आस राखी है तो में जरूर पूरी करूँगा और उन्हें एक स्थान दिखाया जहाँ बड़ा खजाना दबा पड़ा था। और उस दौलत को निकल कर दूसरे दिन वे सभी वापस चले गये और आनन्द से रहने लगे।

      अब पड़ोसी ने उनकी समृद्दि देखी तो पूछा - तुम एक ही रात में इतने सम्पत्तिवान कैसे हो गए ? उन्होंने सारी बात सुना दी। पड़ोसी भी उनकी नक़ल करता हुआ सारे परिवार को लेकर उसी वृक्ष के नीचे पहुँचा और भोजन बनाने का प्रयत्न में जुट गया। उसने बड़े पुत्र से कहा - जाओ, थोड़ी लकड़ियाँ ले आओ। उसने क्रोध से कहा - छोटे को क्यों नहीं कहते हो, क्या उसकी टाँग टूटी हुई है? पिता ने फिर छोटे को कहा।  वह बोला - मैं तो बहुत थक गया हूँ, मुझ से चला नहीं जाता, दुसरो को क्यों नहीं कहते, इनकी टैंगो में पानी नहीं भरा है? पिता ने तीसरे पुत्र से कहा परन्तु वह भी नहीं गया। तंग आकर पत्नी ने कहा - अच्छा, मैं जाती हूँ। इस पर उसने कहा - तू कहाँ जायेगी, बैठी रह, ऊँची - नीची जगह में कहीं गिर जायेगी। वृक्ष पर बैठा देवदूत यह सारा तमाशा देखता रहा। फिर बोला - तुम विचित्र लोग हो। लकड़ी नहीं, पानी नहीं , खाने का सामान नहीं, तब क्या भूखे रहोगे। बड़े लड़के ने कहा - तुम जो हो। देवदूत ने कहा - मैं उनके लिये हूँ जो एक होकर रहते है। तुम तो आपस में ही फूटे बैठे हो। तुम को कुछ देने का कोई लाभ नहीं होगा। यह कह कर वह देवदूत अदृश्य हो गया।

सीख - कभी भी नक़ल नहीं करनी है और परिवार में एकता हो तो वो परिवार सुखी और समृद्ध होगा इस लिये सदा एकता में रहो। 

Saturday, May 3, 2014

Hindi Motivational Stories - " मृत्यु से मित्रता "

मृत्यु से मित्रता 

    एक चतुर व्यक्ति को काल से बहुत डर लगता था। एक दिन उसे चतुराई सूझी और काल को अपना मित्र बना लिया। उससे कहा - मित्र, तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी गाल में धर लोगो। काल ने कहा - सृष्टि नाटक का यह शाश्वत नियम है इस लिए मैं मजबूर हूँ। आप मेरे मित्र है मैं आपकी जितनी सेवा कर सकता हूँ करूँगा ही, आप मुझ से क्या आशा रखते है बताइये। चतुर व्यक्ति ने कहा - मैं इतना ही चाहता हूँ कि आप मुझे लेने पधारने के कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल - बच्चो को कारोबार की सभी बाते अच्छी तरह से समझा दूँ और स्वयं भी भगवान के भजन में लग जाऊँ। काल ने प्रेम से कहा - यह कौन सी बड़ी बात है मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेज दूँगा। मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से काल का भय भी निकल गया, मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊँगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे।

       दिन बीतते गये आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुँची। काल अपने दूतों सहित उस चतुर व्यक्ति के समीप आकर कहने लगा - आपके नाम का वारंट मेरे पास है मित्र चलिए, मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहाँ नहीं छोड़ूँगा। मनुष्य के माथे पर बल पड़ गये, भृकुटी तन गयी और कहने लगा धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर, मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती ? तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूँगा। मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए। मित्रता तो दूर रही तुमने अपने वचनों को भी नहीं निभाया।

        काल हँसा और बोला - मित्र इतना झूठ तो न बोलो। मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो। मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजें। आपने एक भी उत्तर नहीं दिया। मनुष्य ने चौक कर पूछा - कौन से पत्र ? कोई प्रमाण है ? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ। काल ने कहा - मित्र, घबराओ नहीं। मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद है। मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला, आपके काले सुन्दर बालों को पकड़ कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। नाम, बड़ाई और धन - संग्रह के झंझटो को छोड़कर भजन में लग जाओ पर मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ। बनावटी रंग लगा कर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए। आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए है। कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा। नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आँखों पर मोटे शीशे चढ़ा कर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे। दो मिनिट भी संसार की ओर से आँखे बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान, मन में नहीं किया। इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा। इस पत्र ने आपके दाँतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया। और अपने इस पत्र का भी जवाब न देखकर और ही नकली दाँत लगवाये और जबरदस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे। मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूँ और यह हर बात एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है। अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग - क्लेश तथा पीड़ाओ को भेजा परन्तु आपने अहंकार वश सब अनसुना कर दिया।

       जब मनुष्य ने काल के भेजे हुए पत्रों को समझा तो फुट -फुट कर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मो पर पश्चाताप करने लगा। उसने स्वीकार किया कि मैंने गफलत में शुभ चेतावनी भरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा, मैं सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूँगा। अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यो में लगाऊँगा, पर वह कल नहीं आया। काल ने कहा - आज तक तुमने जो कुछ भी किया, राग -रंग, स्वार्थ और भोगों के लिए किया। जान-बूझकर ईश्वरीय नियमों को तोड़ना जो करता है, वह अक्षम्य है। मनुष्य को जब बातों से काम बनते हुए नज़र नहीं आया तो उसने काल को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया।

     काल ने हँसकर कहा - यह मेरे लिए धूल है। लोभ संसारी लोगो को वश में कर सकता है , मुझे नहीं।  यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मो का धन संग्रह करते। काल ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय -हाय करके रोने लगा और सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु काल ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़ा अपने गन्तव्य की ओर।

सीख - समय के साथ उम्र की निशानियों को देख कर तो कम से कम हमें प्रभु की याद में रहने का अभ्यास करना चाहिए और अभी तो कलयुग का अन्तिम समय है इस में तो हर एक को चाहे छोटा हो या बड़ा सब को प्रभु की याद में रहकर ही कर्म करने है।