गणित हमें जीवन को व्यवस्थित करना सिखाता है। इसमें हर सवाल का एक तय उत्तर होता है और हर उत्तर तर्क पर आधारित होता है। जोड़, घटाव, गुणा और भाग से हम बाहरी दुनिया की समस्याएँ सुलझाते हैं।
अध्यात्म इससे अलग रास्ता दिखाता है। यहाँ सवाल काग़ज़ पर नहीं, मन और अनुभव में हल होते हैं। अध्यात्म हमें बताता है कि असली उलझन बाहर नहीं, भीतर होती है।
निराकार और निर्लेप का अर्थ है—जो सबको छूता है, पर किसी से चिपकता नहीं। जैसे हवा हर जगह बहती है, पर किसी एक जगह बँधती नहीं। समस्या तब शुरू होती है जब इंसान अपने विचारों, भावनाओं और पहचान से चिपक जाता है। यही “लेप-चेप” मन को भारी बना देता है।
गणित में गलती सुधारी जा सकती है, लेकिन जीवन में पहचान की गलती—“मैं सिर्फ यही हूँ”—अंदर अशांति पैदा कर देती है। अध्यात्म हमें हल्का होना सिखाता है, चीज़ों को समझकर छोड़ना सिखाता है।
गणित जीवन चलाने का साधन है,
और अध्यात्म जीवन को समझने की कला।
दोनों ज़रूरी हैं, पर संतुलन वहीं बनता है जहाँ समझ गहरी हो जाती है।


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