Wednesday, May 7, 2014

Hindi Motivational Stories - " जैसी दॄष्टि - वैसी सृष्टि "

जैसी दॄष्टि - वैसी सृष्टि 

    एक वृक्ष के नीचे पांच- सात व्यक्ति विश्राम कर रहे थे, एक नृत्यकार है , एक संगीतकार है, एक उदासीन संत है, एक नौजवान है, जो अभी अभी घर से लड़कर आया है, बड़ा दुःखी है बहुत बेचैन है। आराम कर रहे इन्हीं मनुष्यों में एक लकड़ी का व्यापारी भी है।

             अब कुछ देर में मौसम में बदलाव आया हवा के तेज झोंके से डालीयाँ, पत्ते झूमते है, हिलोरे लेते है।  ये सब देखकर जो नृत्यकार है वह नृत्य की दुनिया में खो जाता है। सोचता है मेरे से भी ज्यादा सुन्दर यह वृक्ष नृत्य कर रहा है। इसकी डालियाँ में कितनी लचक है, इसके पत्ते कितने सुन्दर ढंग से झूम रहे है। पेड़ का नृत्य देखकर नृत्यकार विस्माद् की दुनिया में खो जाता है। उसको वृक्ष नाचता हुआ प्रतीत होता है।

           दूसरा, संगीतकार है, जब हवा के तेज झोंके पेड़ से स्पर्श करते है, सायं - सायं की आवाज़ बुलन्द होती है, वह संगीतकार सुर व् संगीत की दुनिया में खो जाता है। सोचता है सिर्फ मैं ही नहीं गा रहा हूँ यह वृक्ष भी गा रहा है। गीत, संगीत इस वृक्ष से भी निकल रहा है। नृत्यकार को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वृक्ष नृत्य कर रहा है, संगीतकार को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पत्ते पत्ते से संगीत का जन्म हो रहा है।

          तीसरा, उदासनी महात्मा क्या देखता है, एक सुखा पत्ता हवा के झौके से डाली से टूट कर जमीन पर आ गिरता है। आँखों में आँसू आ गये सन्त के। मुख से शब्द निकला, एक दिन संसार रूपी वृक्ष से भी ऐसे ही टूटकर गिर जाऊंगा, जैसे पत्ता टूटकर गिर दिया। जैसे गिरे हुए पत्ते को पुनः वृक्ष व डालियाँ से जुड़ता असंभव है, वैसे ही मरे हुए मनुष्य को अपने कुटुम्ब सम्बन्धियों से तथा संसार से जुड़ना बहुत असंभव है, बहुत असंभव। और वैराग की दुनिया में खो गया, स्वयं उपराम हो गया कि यहाँ तो सारे पत्ते झड़ने ही है।

         चौथा, मनुष्य जो आराम कर रहा था वह लकड़ी का व्यापारी है, वह सोचता है कि अगर यह पेड़ मैं खरीद लूँ तो इस में इमरती लकड़ी कितनी, जलाऊँ लकड़ी कितनी और उस में से बाकी मालवा जो है वह कोपला बना सकेगा कि नहीं ? मैं कितने का यह वृक्ष खरीदूँ, कितने का बेचूँ, क्या मुझे बचेगा ? सोचकर वह व्यापार की दुनिया में खो गया।

        अब पाँचवा, जो आराम कर रहा था वह एक नौजवान था, अभी- अभी घर से लड़कर आया है, हवा के तेज झौको से जब शाखा, शाखा से टकराती है, पत्ते -पत्तों से टकराते है, वह सोचता है झगड़ा तो यहाँ भी है, शाखा, शाखा से लड़ रही है, पत्ते, पत्तों से लड़ रहे है सिर्फ मेरे घर में ही लड़ाई नहीं है, यहाँ वृक्ष में भी बहुत बड़ी लड़ाई है।

सीख - जैसी-जैसी दॄष्टि है मनुष्य की वैसी ही सृष्टि दिखाई देती है अथार्त जैसी नज़र है वैसे ही नज़ारे देखने को मिलते है। वृक्ष एक ही है लेकिन सब के अलग-अलग दॄष्टिकोण से दिखता है। इन्ही अलग - अलग दॄष्टिकोण से ही परमात्मा के अनेक नाम रूप प्रचलित हुए है।

Hindi Motivational Stories - " सच्चा स्नेह "

सच्चा स्नेह 

    सुभद्रा कृष्ण की बहन थी लेकिन कृष्ण का द्रौपदी के साथ अधिक स्नेह था। सुभद्रा को यह महसूस होता था और वह कृष्ण से पूछती रहती थी ऐसा क्यों, आपका द्रौपदी के साथ मेरे से अधिक स्नहे क्यों ? एक दिन श्रीकृष्ण के अँगुली में गन्ना खाते समय गन्ने का छिलका लग गया और खून बहने लगा, तो फ़ौरन आवाज़ निकला कि कोई कपड़ा लाओ और अँगुली पर बाँधो। सुभद्रा छोटा सा कपड़ा ढूंढ़ती रही और द्रौपदी जो वहाँ खड़ी थी उसने अपनी कीमती साड़ी से कपड़ा फाड़कर श्रीकृष्ण की अँगुली पर बाँध दिया। तब श्रीकृष्ण की अँगुली ने कहा कि देखो इस कारण मुझे द्रौपदी से अधिक स्नेह है क्यों कि उसका मेरे साथ अधिक स्नेह है। उसने अपनी कीमती साड़ी की फिकर न कर मेरी अँगुली तथा खून का महत्व समझ साड़ी से कपड़ा फाड़कर मेरी अँगुली पर बाँध दिया।

सीख - इस घटना से हमें ये सीख मिलता है जो जिस से जितना ज्यादा स्नेह करता है उतना ही स्नेह वो पाएगा इस लिए अगर हम ज्यादा प्यार ईश्वर से करेंगे तो उतना ही प्यार हमें ईश्वर से भी मिलेगा। 

Hindi Motivational Stories - ' स्वमान सम्मान देता है '

स्वमान सम्मान देता है 

         एक संन्यासी अपने गन्तव्य स्थान की लकड़ी के सहारा लिए अंधकारमय रास्ते के बीचों-बीच बढ़ता जा रहा था। उसे स्पष्ट दिखाई भी नहीं दे रहा था। और सामने से अचानक उस अंधकारमय रास्ते में उस राज्य का बादशाह अकेले राजधानी का भ्रमण करता हुआ  पहुँचा। बादशाह ने अपने आपको सम्राट मानते हुए रास्ते से अलग हटने की आवश्यकता नहीं समझी और संन्यासी को अन्धेरे के कारण बराबर दिखाई नहीं दिया। अंतः दोनों की टक्कर हो गयी। इस से बादशाह को बड़ा क्रोध आया और कहा - देखकर नहीं चलते, कौन हो तुम ?

         संन्यासी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया - मैं सम्राट हूँ.… । बादशाह खिलखिला कर हँस पड़ा और उसने व्यंग्य  के साथ कौतूहलवश पूछा - अच्छा सम्राट ! यह बताईये कि मैं कौन हूँ ? तुम गुलाम हो। संन्यासी ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया। यह तो सरासर बादशाह का अपमान था। अपमानित राजा आगबबूला हो गया और गश्त लगाने वाले सिपाहियों को आदेश दे उस संन्यासी को जेल में डलवा दिया। अगले दिन प्रातः काल दरबार में बादशाह ने संन्यासी को बुलवाया और पूछा - रात को तुमने अपने आपको बादशाह और मुझको गुलाम क्यों कहा ?

      संन्यासी ने धैर्यता,शांतिपूर्वक और मधुर वाणी से जवाब दिया - इसलिए कि मैंने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया हूँ। इच्छाओं और वासनाओं का मैं विजेता हूँ। आपने मुझे कैद कर लिया फिर भी मेरे मन में आपके प्रति तनिक भी रोष नहीं है और आप अपने ही गुलाम है, अपनी जिहा के, अपनी वासनाओं के..... और मैं अपने मन का सम्राट हूँ। यह मेरा स्वमान है। राजा उसकी बातों से अत्यंन्त प्रभावित हुआ और उस संन्यासी को बड़े सम्मान के साथ बिदायी दी और कहा जब भी ऐसा कुछ हो तो हमें सेवा का मौका दे ये यचना भी किया।

सीख - स्वमान ही सम्मान देता है, इस में समय जरूर लगता है। अपने आप को स्वमान में सेट करने में पर एक बार अपने इस पर कार्य किया तो ये आप को सम्मान के साथ जीवन जीने देता है। स्वमान और सम्मान एक सिक्के के दो पहलू है। इसलिए स्वमान में रहो। 

Tuesday, May 6, 2014

Hindi Motivational Stories - " सकारात्मक दॄष्टिकोण "

सकारात्मक  दॄष्टिकोण 

  एक प्रसिद्ध जूता बनाने वाली कम्पनी ने एशिया खण्ड में मॉल्स की श्रृंख़ला खोलने का विचार किया। सफलता सुनिश्चित करने के लिये कम्पनी प्रबंधन ने एशिया खण्ड के बाजार का गहन सर्वेक्षण करवाया। पहला सर्वेक्षण टीम के परिणाम, कुछ इस प्रकार मिले -  देश के मूल निवासी असभ्य, बबर्र और जंगली है , जो जानवरों के चमड़े और पेड़ो के पत्तों से बने कपड़े और टोपी भी केवल ठंड और बरसात में ही पहनते है। ऐसे में जब कि कपडे भी उनके लिए अनावश्यक है तब वहाँ जूते बेचना मूर्खता है। अब कम्पनी के अध्यक्ष ने इस रिपोर्ट को एक तरफ किया और उसी सर्वेक्षण के लिए दूसरी टीम को फिर भेजा। नई टीम ने लिखा - सड़कों के अभाव तथा यातायात के साधनों की कमी के कारण जूते इस देश के नागरिकों के लिए वरदान सिद्ध हो सकते है। स्थानीय लोगों और चिकित्सकों के संदर्भ से यह जानकारी मिली है कि स्थानीय लोगों को सब से ज्यादा चोट पैरों में लगती है अंतः जूतो के व्यापार में सफलता संभव है। अध्यक्ष ने इस नई रिपोर्ट पर पूरा ध्यान दिया और वहाँ तत्काल काम शुरू किया। और सफलता पाया। 

सीख - एक छोटी सी बात बताती है कि दॄष्टिकोण  का परिणाम पर कितना असर पड़ता है। इस लिए हमेशा अपनी सोच को नज़र को सकारत्मक रखे। यही सफलता का राज है। 

Hindi Motivational Stories - " शंका दुःख का कारण "

शंका दुःख का कारण

     मेरे दोस्तों हम सब जीवन जीते है हमारा खाना पहनावा लग भग एक जैसा ही है १९ /२० का फरक वो एक अलग बात है। जीवन में सुख सब चाहते है और इस सुख के लिये हम वस्तु वैभव और दूसरों से अपेक्षाएँ करते है पर फिर भी सुख पाने की आशा बानी ही रहती है। और एक सुखमय सन्सार दुःख में कैसे बदलता है इस के लिए एक छोटी कहानी के दवरा समझेंगे।

          एक बहुत ही प्यारा परिवार था, राम और श्याम दो सागे भाई थे। दोनों का आपस में बहुत प्यार था,  दोनों की पत्नियाँ भी सुशील और संस्कारी थी। गृहस्थी बड़े सुन्दर ढंग से चल रही थी। राम यदि कोई भी वस्तु अपनी पत्नी के लिए लाता तो ठीक वैसे ही श्याम की पत्नी के लिए भी लाता था। खुद के लिए कोई  वस्तु  लाता तो ठीक वैसी ही अपने छोटे भाई के लिए भी ले आता था। अब एक बार राम एक जैसी दो साड़ीयाँ लाया। उसने अपनी पत्नी से कहा - पहले छोटी बहु को पसन्द की साड़ी दे देना, बची हुई तुम रख लेना। पत्नी ने वैसा ही किया।

        एक किसी प्रसंग पर दोनों ने वे साड़ीयाँ पहनी थी। अब हुआ ऐसा की राम की पत्नी की साड़ी की अन्य महिलाओं ने तारीफ की जब कि श्याम की पत्नी की साड़ी का सिर्फ रंग ही अलग था पर किसी ने भी उसकी तारीफ नहीं की। बस, शंका का जन्म हो गया कि जान-बूझकर मेरे जेठ ने अलग रंग की साड़ीयाँ खरीदी है। दोनों भाईयों में जो आज तक अपूर्व विश्वास था , सिर्फ एक छोटी-सी शंका ने ऐसा कहर ढा दिया कि उनकी गृहस्थी पूर्णतः नर्क में परिवर्तित हो गयी। दोनों परिवार साथ रहते थे पर शंका के कारण दोनों अलग अलग परिवार में रहने लगे।

सीख - दोस्तों इस कहानी से एक बात हम सीख सकते है चाहे कुछ भी हो शंका को दूर ही रहने देना चाहिए। क्यों की शंका ही दुःख का मुख्या कारण है। 

Hindi Motivational Stories - 'ट्रस्टीपन'

'ट्रस्टीपन' 

              एक राजा वर्षो तक सुखपूर्वक राज्य करता रहा लेकिन कुछ समय बाद देश में समस्याये बढ़ गयी तो उसकी चिंता भी बढ़ने लगी। उसे न भूख लगती, न नींद आती। वह बहुत परेशान रहने लगा। घबराकर वह अपने गुरु के पास गया, बोला - गुरुदेव, राज - काज में मन नहीं लगता, राज्य में परेशानियाँ बढ़ गयी है, इच्छा होती है, राज - काज छोड़कर कहीं चला जाऊँ। गुरु अनुभवी था, उसने कहा - राज्य का भार पुत्र को सौंप दो और आप निश्चिंत रहो। राजा ने कहा, पुत्र अभी छोटा है। फिर गुरु ने कहा - अपना राज्य मुझे सौंप दो। राजा खुश हो गया। उसने पूरा राज्य गुरु को सौंप दिया और स्वयं वहाँ से जाने लगा। गुरु ने पूछा - कहाँ जा रहे हो ? राजा ने उत्तर दिया - किसी दूसरे देश में जाकर धंधा करूँगा। गुरु ने कहा - इसके लिए धन कहाँ से आयेगा ? राजा ने कहा - खज़ाने में से ले जाऊँगा।

             गुरु ने कहा, खज़ाना आपका है क्या ? वह तो आपने मुझे सौंप दिया। राजा ने कहा - गुरुदेव गलती हो गयी, मैं यहाँ से कुछ नहीं ले जाऊँगा। बाहर जाकर किसी के पास नौकरी कर लूँगा। तब गुरु ने कहा - नौकरी ही करना है तो मेरे पास ही कर लो। राजा ने पूछा - काम क्या करना होगा ? गुरु ने कहा - जो मैं कहूँ, वही करना होगा। राजा ने गुरु का आदेश स्वीकार कर लिया और उसके यहाँ नौकर हो गया। गुरु ने उसको राज्य की सम्भाल का पूरा काम दे दिया। जो काम राजा पहले करता था वही पुनः उसके हिस्से में आ गया। अन्तर सिर्फ यह रहा कि अब वह राज - कार्य भार नहीं रहा बल्कि निमित्त भाव से कार्य किया जाने लगा। अब उसे भूख भी लगाने लगी, नींद भी आने लगी। कोई भी समस्या नहीं रही।

          एक सप्ताह बाद गुरु ने राजा को बुलाकर पूछा - अब क्या हाल है। राजा ने कहा - आपका उपकार कभी नहीं भूलूँगा। अब मैं परमानंद में हूँ। वही स्थान, वही कार्य पहले बोझ लगता था, अब खेल लगता है, तनाव दूर हो गया और जिम्मेदारी का बोझ उत्तर गया है।

सीख - ये सन्सार ईश्वर की रचना है और हम उस रचयता के रचना याने बच्चे हो गये।  भगवान हमारा पिता है। इस लिये भगवान भी कहते है बच्चे, आपके पास जो भी कुछ है , उसमें से मेरा-पन निकाल कर, उसे ईश्वर की अमानत मानकर, श्रीमत प्रमाण सेवा में लगाओ तो आप भी हल्के हो जायेंगे। बोझ सम्बन्धो और वस्तुओ का नहीं होता है। मेरे पन में होता है। अंतः मेरे- पन को तेरे - पन में बदल दो। 'मेरा' के स्थान पर 'तेरा ' कर दो। मेरा नहीं 'ईशवर का ' यह महावाक्य जीवन का आदर्श बना लो।  

Hindi Motivational Stories - " इच्छाओ को जीतो "

इच्छाओ को जीतो 

                 सिकन्दर जब भारत में आया तो उसने एक योगी की दिल से सेवा की। योगी के दिल में आया कि सिकन्दर को जरूर कोई इच्छा है जिसके कारण यह मेरी इतनी सेवा कर रहा है। उसने राजा सिकन्दर से पूछा - आप क्या चाहते है ? राजा ने कहा - मेरा सारे विश्व पर राज्य हो जाये। योगी ने कहा - तथास्तु , लेकिन मेरी एक शर्त है , यह एक खप्पर है इसे आप अनाज से भर देना। सिकन्दर ने कहा - महाराज जी , आप अनाज की बात कर रहे है, मैं तो इसे हीरों से भर दूँगा। तभी उसने सैनिकों से हीरे मँगवाये और लगा भरने। बहुत देर हो गई भरते - भरते लेकिन खप्पर भरने को ही नहीं आया। सिकन्दर थक गया। योगी ने कहा - यह खप्पर मानव की इच्छाओं का प्रतिक है , यह कभी नहीं भरता। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी आ जाती है, दूसरी पूरी होती है तो तीसरी आ जाती है। इस तरह मानव की इच्छाये कभी पूरी नहीं होती है। आज आप विश्व पर राज्य करना चाह रहे है फिर आकाश पर और अन्य ग्रहों पर राज्य करना चाहेंगे। इस तरह सारे विश्व पर राज्य प्राप्त करने के बाद आपकी इच्छाये शान्त होने के बजाये और बढ़ेगी। 

सीख - ' इच्छा मात्रम अविद्या ' जो व्यक्ति अपने इच्छाओं को समझ ले और उन पर विजय बने तो वह बिना कुछ पुरषर्थ के भी सुखमय जीवन जी सकता है। किसी ने ये कहा है की मनुष्य अपने इच्छाओं को कम कर दे तो वो सुखी बन जाएगा।