Monday, June 2, 2014

Hindi Motivational Stories........ सच्चे दिल से प्रभु समर्पण हो

सच्चे दिल से प्रभु समर्पण हो 

     एक बार एक लकड़हारा अपनी प्यास बुझाने के लिए कुए में झाँका तो वह आश्चर्य नज़रों से कुए में देखता ही रह गया। वह अपनी प्यास भी भूलकर आश्चर्यचकित हो गया, उसने देखा - एक सन्यासी जंजीरों के सहारे कुए में उल्टा लटका हुआ है। उसने लोहे की मज़बूत जंजीरो से अपने पैरोँ को बाँधा हुआ है। श्राप के भय से भयभीत होते भी लकड़हारे  सन्यासी से पूछने का साहस किया। 

 लकड़हारा -  महात्मन ! आप क्या कर रहे है ? 
 संन्यासी   - बेटा, भगवान से मिलने के लिए कठोर तप कर रहा हूँ। मुझ से प्रसन्न होकर एक दिन भगवान अवश्य ही दर्शन देंगे।
लकड़हारा  -  क्या ऐसा करने से भगवान प्रसन्न हो जायेंगे ?
संन्यासी  -  हाँ, जब अपने भक्त  अधिक पीड़ामय देखेंगे तो भगवान से सहन नहीं होगा और वे दौड़े चले                           आयेंगे।
       लकड़हार पानी पीना भूल गया और उसने सोचा की मैं  भी ऐसा करूँगा। उसने घास की रस्सी बनायीं और उस कुआ पर एक लकड़ी रख कर उसमें रस्सी बाँध कर वह लटकने लगा। परन्तु ज्युँ ही वह लटका, रस्सी उसका बोझ झेल न सकी और टूट गयी। उसकी आँखे बंद हो गयी परन्तु अगले ही क्षण अपने आपको भगवान की बाँहो में पाया। अब उसकी ख़ुशी का पारावार नहीं था। उसी क्षण भगवान ने उस सन्यासी को भी दर्शन दिये। 

          संन्यासी ने प्रभु से प्रश्न किया ? मैं इतने दिन से तपस्या कर रहा हूँ।  मुझे अपने बहुत दिन बाद दर्शन दिये और इस लकड़हारे को अभी-अभी आपने अपनी बाहों में थाम लिया। 

               प्रभु मुस्कुराए, बोले - भक्त, तुम पुरे इन्तजाम से कुए में लटके थे। ताकि तुम गिर न सको। परन्तु यह लकड़हारा पूर्णत: मुझ पर समर्पण हो चुंका था। उसने यह सोचा ही नहीं कि मेरा क्या होगा। इस लिए उसकी भक्ति श्रेष्ठ है। तुम में अपनेपन का मान था, वह सर्वस्व न्यौछावर कर चूका था। 

सीख - समर्पण प्रयोजन से नहीं दक से दिल से हो तो समर्पण स्वीकार होता है ईश्वर को इस लिये सच्चा दिल 
 ईश्वर पर बलिहार जाने से ईश्वर का दर्शन होता है।

Sunday, June 1, 2014

Hindi Motivational Stories......................दान दो, धनवान बनो

दान दो, धनवान बनो 


       धनपतराय करोड़पति सेठ थे, पर स्वाभाव से बड़े कंजूस। उनकी पत्नी थी सुमति। वह शीलवान, दयालु, सहनशील तथा दानी स्वाभाव की थी। उसने दाता का गुण अपनी माँ से सीखा था। सेठ जी जब काम-धन्धे पर जाते थे तब सुमति दीन-दुःखी की मदत करती, गरीबों की सहायता करती, बच्चों को पढ़ती, साधु-महात्माओं को खिलाती-पिलाती, दान-दक्षिणा देती। वह भूखे को अपने पेट की रोटी भी दान दे देती थी। सुसंस्कारी थी। कभी-कभार धनपतराय को पता चलता तो वह उसे खूब डाँटता -तुम तो बड़ी खर्चीली हो,मैं दिन-रात मेहनत करता और तुम खर्च करती रहती। सेठ जी को धनवान बनने की लालसा थी। सोने की चारपाई पर लेटा हुआ हूँ, सोने की थाली में खाना खा रहा हूँ - इसके वे दिन-रात स्वप्न देखा करते थे। और यही कारण था कि वे दिन-प्रतिदिन पाई-पाई जुटाकर पूँजी को बढ़ाने में व्यस्त रहते थे।

    एक दिन सेठ जी बाहर गये हुये थे। सुमति अकेली घर में थी। द्द्वार पर एक साधू-महात्मा आये। दिव्य ज्ञान से उनका मस्तक चमक रहा था। पवित्रता की सुगन्ध सर्वत्र फ़ैल रही थी। सुमति ने आदरपूर्वक उन्हें घर में बुलाया और अपने लिए बनाया हुआ भोजन तथा मिठाईयां आदि खिलायी। रुचिकर भोजन खाकर साधु संतुष्ट हुए। वह उन्हें दक्षिणा देने जा रही थी कि उतने में सेठ जी ने घर में प्रवेश किया। सेठ जी आग-बबूला हो उठे। उन्होंने पत्नी को डाँटना शुरू किया - पता नहीं तुम्हारी बुद्धि कैसी भ्रष्ट हुई है, मैं मेहनत करता हूँ और तुम इन लफंगे ढोंगी साधुओं को खिलाकर लुटाती रहती हो। इन दर-दर भटकने वालों का क्या भरोसा ? तुम कहीं मेरा घर न लूटा दो। बहुत भली-बुरी सुनाकर सेठजी ने साधु को निकालना चाहा। पर साधु जी शांत मुद्रा में खड़े थे। सारी भावनाओं को भली- भाँति समझ चुके थे।

     साधु जी ने कहा -सेठ जी ! क्या तुम्हेँ धनवान बनने की इच्छा है ? धन, सोना और रत्नों को पाने की इच्छा है ? सेठ जी बोले - हाँ, में सोने की चारपाई पर चैन की नींद सोना चाहता हूँ। साधु ने कहा - मैं भोजन कर प्रसन्न हुआ। तुम्हें जो चाहे दे सकता हूँ। धनपतराय जी का मन लालच से भर उठा। उन्होंने कहा - उपाय बताओ महाराज। साधु ने अपनी झोली से एक छोटा बीज निकाला और सेठ जी को देते हुए कहा - ये बीज तुम्हें सच्चे रत्न देगा (सेठ जी बड़े खुश हो रहे थे ), इस बीज को घर के पीछे बगीचे में लगाना। नित्य नियम से पानी देना। हीरे - रत्नों के फल लगेँगे। लेकिन यह याद रहे कि यह बीज तब फलीभूत होगा जब तुम सबके सहयोगी बन मदत करेंगे, सब की सेवा करोगे। सब को सम दृष्टि से देख उनसे व्यवहार करोगे। दान करोगे। जितना सत्कर्म करोगे, प्रभु चिन्तन करेंगे उतने ही जल्दी फल लगेंगे। इस बीज को प्रतिदिन शुभ-भावना रूपी जल से सीचना तो सहज फल मिलेंगे, अन्यथा नहीं।

    सेठ जी बीज बोया।और सच, एक दिन पौधा भी निकल आया। उन्हें आश्चर्य हुआ तथा विश्वास भी। अब वे साधु की हर एक बात का ध्यान रखने लगे। उन्होंने रोज सत्कर्म करना, सबके प्रति शुभ भावना रखना शुरू किया। सब की मदद कर उन्हें सुख देने लगे। असहाय की सहायता कर उनकी दुआओं लेने लगे ,हरेक के प्रति आत्मीयता उनके मन में जगने लगी। सब के साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करने लगे।  उन्हें लगता - अब तो जल्दी ही मैं धनवान हो जाऊँगा। उन में परिवर्तन  देख सब खुश हो उन्हें दुआये देते। दुआओ को पाकर  सेठ जी शांति का अनुभव करते। अब धीरे- धीरे सेठ जी की धन इकट्ठा करने की लालसा क्षीण होती गयी और दान करने की इच्छा दिनोंदिन बढ़ने लगी। अब वे तृप्त थे और समझ चुके थे कि सच्चे रत्न से धनवान मैं बन गया हूँ। ये तो साधु की युक्ति थी मुझे शिक्षा देने की। धनपतराय, शान्ति पाकर अपने को अब धन्य-धन्य महसूस कर रहे थे।

सीख - सच्चा सुख देने में है लेने में नहीं जब इस की महसूसता आती है तो मन शांति से भर जाता है। और जो व्यक्ति शान्ति से भरपूर है वही सच्चा धनवान है। 

Saturday, May 31, 2014

Hindi Motivational Stories ......ऐसा भी होता है

ऐसा भी होता है

           एक राजा बहुत दानी था। मरने के बाद जब धर्मराज के समाने गया तो चित्रगुप्त ने बताया कि राजा के खाते में लाखों मछलियाँ मारने का पाप लिखा है। राजा ने कहा मैं तो शाकाहारी था और मैंने कभी मछली को हाथ भी नहीं लगाया। तब चित्रगुप्त ने बताया कि आपके राज्य के एक मछुवारे ने आपके दान के पैसों से मछली पकड़ने वाले जाल की नई जाली खरीदी थी। परिणाम स्वरूप आपके खाते में दान - पुण्य जमा नहीं हुआ बल्कि पाप का खाता ही बढ़ गया। इस तरह से सेवा और जमा खाते  फर्क रह जाता है उसे समझा जा सकता है। मतलब दान हमेशा सुपात्र को दें।

सीख - दान भी सोच समझ करना है। 

Thursday, May 29, 2014

Hindi Motivational Stories - तुलना से असन्तोष

तुलना से असन्तोष 

       एक बार एक मालिक ने १०० रुपये प्रतिदिन के हिसाब से ४ मजदूरों को काम पर लगाया जो सुबह ८ बजे काम पर आते थे और सायंकाल ५ बजे जाते थे। प्रतिदिन दोपहर एक घण्टे की छुट्टी मिलती थी। ये मजदुर नौकरी पाकर खुश थे और बड़ी सन्तुष्टता के साथ कार्य कर रहे थे। कुछ दिन के बाद मालिक ने ४ और मजदूरों को काम पर लगाया जो दोपहर १२ बजे काम पर आते थे और सायं ५ बजे जाते थे। उन्हें भी प्रतिदिन १०० रुपये ही मिलते थे। सुबह आने वाले मजदूरों ने एक-दो दिन तो यह सब देखा फिर उनमें कानाफूसी शुरु हो गयी कि हम ८ घण्टे काम करके भी १०० ही रुपये प्राप्त करते है और ये मजदुर केवल ५ घण्टा काम करते है परन्तु पाते है पुरे १०० रुपये। ऐसा क्यों ?

        धीरे-धीरे यह कानाफूसी जोर पकड़ती गयी। वे अपना काम करते-करते भी बीच-बीच में उन दूसरे मजदूरों को देखने लगे और काम से उनका ध्यान हटने लगा, असंतोष जीवन में छाने लगी, एकाग्रता भंग हो गयी और उनके कार्य में अनेक प्रकार की त्रुटियाँ निकलने लगी। पहले जिनके कार्य की सर्वत्र प्रशंसा हो रही थी, अब उन्ही के कार्य को असंतोषजनक कहा जाने लगा। इस असन्तोष का कारण है तुलना। जब तक तुलना नहीं कि किसी के साथ, पहले वाले मजदुर धन्य थे परन्तु दूसरे मजदूरों से तुलना करके, अपने पलड़े को हल्का पाकर उनके  श्रम में कमी हो गयी और परिश्रम भी कम नज़र आने लगा।

 सीख -  ऐसा ही आज मानव जीवन में भी हो रहा है। व्यक्ति के पास कोई कमी नहीं है परन्तु दूसरे से तुलना करने पर कई कमियाँ निकल ही आती है! तुलना करने के बजाये यदि दूसरे की भौतिक प्राप्तियों को तूल (महत्व ) ना दिया जाये तो इस समस्या का समाधान हो सकता है।




Wednesday, May 28, 2014

Hindi Motivational Stories ....... माँ का वात्सल्य


माँ का वात्सल्य 

            एक बार एक व्यापारी दो घोड़ियों को लेकर राजा के दरबार में उपस्थित हुआ और नम्रतापूर्वक राजा से निवेदन करने लगा कि अपके दरबार में एक से एक ज्ञानी है, क्या उन में से कोई भी यह बता सकता है कि इन दोनों घोड़ियों में से माँ कौन है और बेटी कौन है। राजा के लिए यह चुनौती भरा प्रश्न तो था ही, साथ ही दरबार की प्रतिष्ठा का भी सवाल था। सोच विचार कर राजा मन्त्री को इस रहस्य से पर्दा उठाने का भार सौप दिया।

     दरबार की समाप्ति पर उदास चेहरे के साथ मंत्री जब घर लौटा तो उनकी बुद्धिमान पुत्र वधु विशाखा ने उदासी का कारण जानना चाहा। मंत्री जी पहले तो टालते रहे परन्तु बाद में विशाखा के स्नेह भरे आग्रह के आगे नत मस्तक हो गये और सारी बात उसे बता दी। वह सुशील नारी इस छोटी-सी बात को सुनकर मुस्करा दी और कहा - पिता जी, यह तो बहुत आसान काम है। मंत्री जी ने उसके समाधान सूचक चेहरे को पढ़कर धिरे से पूछा - कैसे बेटी ?

    विशाखा ने कहा - पिता जी, दोनों घोड़ियों को अलग-अलग पात्र में दान डाल देना, जो माँ होगी वह धिरे-धिरे खायेगी और बेटी होगी वह जल्दी-जल्दी खायेगी। बेटी अपने पात्र का दाना समाप्त कर, माँ के पात्र में मुँह डालेगी और माँ हटकर बेटी को खाने देगी। इस प्रकार आपको पहचान हो जायेगी।

    निधार्रित समय पर दरबार में राजा, व्यापारी, दरबारीगण आये और मंत्री जी ने घोड़ियों की अलग-अलग पहचान बता दी। सौदागर इस पहचान से संतुष्ट हुआ। उसने राजा के ज्ञानी मंत्री को और राजा को साधुवाद दिया। और चल दिया अपने राह पर। परन्तु राजा के मन में प्रश्न उत्पन्न हुआ कि ऐसा हल मंत्री के मन की उपज कैसे हो सकता है, यह अवश्य ही किसी वात्सल्यमय नारी के द्वारा सुझाया गया है। राजा के पूछने पर मंत्री ने अपनी पुत्रवधु की बुद्धि का सच्चा- सच्चा हाल कह सुनाया। राजा ने दूसरे दिन विशाखा को दरबार में बुलाकर सम्मानित किया।

सीख - हर जगह हम समर्थ नहीं होते है तो अपने से छोटो का भी कभी कभी सहयोग लेना चाहिए या उनसे उस विषय के बारे में बात करनी चाहिये। जिस के बारे में हमें पता न हो।  ताकि विचार- विमर्श हो सके।



Monday, May 26, 2014

Hindi Motivational Stories............... सत्य से बढ़कर असत्य

सत्य से बढ़कर असत्य 

     बहुत समय पहले की बात है जब राजा महाराजा अपने मंत्रियों से काफी प्रभावित रहते थे। जैसे राजा अकबर और राजा कृष्णराय और तेनालीरामा ऐसे ही एक राजा के पास मंत्री था वो कभी भी झूठ नहीं बोलता था। राजा एक दिन उस मंत्री की परीक्षा लेने की सोची। और भरे दरबार में सम्राट ने अपने हाथ के पंजे में एक पक्षी को लिया और मंत्री से पूछा - बताओ,  पक्षी जिंदा है या मृत ? मंत्री के सन्मुख यह नई तथा विचित्र परीक्षा की घड़ी थी। यदि वह कहता है कि पक्षी जिंदा है तो सम्राट पंजा दबा कर उसे मार देगा और यदि वह कहता है कि पक्षी मृत है, तो सम्राट पंजा खोलकर उसे उड़ा देगा। मंत्री के दोनों ही उत्तर झूठे ठहराये जाने की पूरी संभावना थी। आखिर मंत्री ने फैसला किया यदि मेरे एक झूठ से पक्षी के प्राण बच सकते है,  तो झूठ भी मुझे मंजूर है।

        मंत्री ने कहा - हे सम्राट,  आपके पंजे में जो पक्षी है, वह मृत है। ऐसा सुनते ही सम्राट ने पंजा खोल दिया और पक्षी उड़ गया। सम्राट  ने कहा - आज तो तुमने झूठ बोल दिया। मंत्री ने जवाब दिया - महाराज, यदि मेरे इस झूठ से इस निर्दोष पक्षी की जान बच गयी है, तो यह झूठ बोलकर भी मैं विजयी ही हूँ , हारकर भी विजयी हूँ।

       इस उत्तर से सम्राट बहुत खुश हुआ और भरे दरबार में उसकी तारीफ करने को विवश हो गया। कल्याण के लिए बोला गया झूठ, कई बार सत्य से भी बढ़कर होता है। सत्य लचीला होता है, वह व्यक्ति, समय, स्थान और परिस्थिति को परखकर निर्धारित होता है। एक व्यक्ति के सम्बन्ध में जो झूठ है, वही दूसरे के सम्बन्ध में कल्याणकारी हो सकता है।

सीख - किसी मासूम की जान बचाने ने लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं पर वो कल्याणकारी होता है इस लिए कहा गया सत्य से बढ़कर असत्य।
    

Hindi Motivational Stories............मृत्यु की स्मृति और पाप से मुक्ति

  " मृत्यु की स्मृति और पाप से मुक्ति "


              एक संत थे जिनका जीवन निष्पाप एवं पवित्र था। बहुत लोग उनके उपदेश सुनने आते थे। एक दिन एक युवक ने संत से कहा - महात्मन ! मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि आप पाप रहित जीवन कैसे जी सकते है ? कितनी भी कोशिश कर लूँ फिर भी मुझ से पाप तो हो ही जाता है। आप पाप रहित जीवन कैसे जीते है, कृपया पाप रहित जीवन का रहस्य मुझे समझाइये।

                संत ने कहा - वत्स बहुत अच्छा हुआ जो तुम आ गये। क्यों कि मुझे तुम से एक विशेष बात करनी थी। युवक ने उत्सुकता से पूछा -महात्मन ! कैसी बात ?

      संत ने कहा - बेटे ! बात तेरे जीवन से सम्बन्धित है। आज सुबह मैंने सपने में देखा कि ठीक सातवें दिन आपकी मृत्यु होनी वाली है। तेरे पारिवारिक जनों का विलाप सुनकर मेरी नींद खुल गयी।  बेटे, मेरा सुबह का सपना हमेशा सच्चा होता है।

    मृत्यु की बात सुनते ही युवक के दिल की धड़कन बढ़ गयी, आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा, हाथ-पैर भय से कापने लगे और सिर चकराने लगा। वह वहाँ से सीधा भगवान के मन्दिर में जाकर उनके चरणों में झुककर प्रार्थना करने लगा - हे प्रभु ! हे मेरे रक्षक ! मैंने अपनी ज़िन्दगी में बहुत पाप किये है। पाप करके कभी मैंने पश्चाताप नहीं किया। मैं अपनी करनी को शब्दों द्वारा व्यक्त नहीं कर सकता। प्रभु ! मुझे माफ़ कर दीजिये। जब वह घर लौटा तो उसका खाने - पीने, हँसने - बोलने में मन नहीं लगा। संसार के वैभव अब उसे आकर्षित नहीं कर रहे थे। पाप करना तो दूर अब तो पाप करने की इच्छा भी नहीं पैदा हो रही थी। संसार की सारी वस्तुएं उसे निःसार लगने लगी क्यों कि कोई ऐसी वस्तु नहीं थी जो उसे मृत्यु से बचा ले।

    धन, दुकान, माकन, पुत्र, पत्नी, परिवार और मित्र कोई भी उसे मृत्यु बचा नहीं सकता था। वह सोचने लग कि क्या कोई ऐसा डॉक्टर नहीं जिसके कैप्सूल से मौत रुक जाये, क्या कोई ऐसा वकील नहीं जो मृत्यु को स्टे- आर्डर दे सके, क्या कोई ऐसा वैज्ञानिक नहीं जिसके शोध से यमराज की गति अवरुद्ध हो जाये। बहुत सोचने पर उसे अहसास हुआ कि सद्गुण और प्रभुस्मरण ही एकमात्र आधार है। तभी उसने हृदय में पवित्रता का संचार होने लगा।

  इस प्रकार निष्पाप एवं पवित्र भावों से उसके छः दिन बीत गये। सातवें दिन का जब सूर्योदय हुआ तो उसके मन से मृत्यु का भय निकल चूका था। इतने में संत उसके घर पहुँचे और पूछा - वत्स ! सात दिन में तुमने कितने पाप किये ? उसने कहा - महात्मन ! पाप करना तो दूर, पाप करने के विचार भी पैदा नहीं हुये। जब मौत सिर पर खड़ी हो तो मन पाप में कहाँ लगता है, गत छः दिनों में मेरा जीवन ही बदल गया है, संत ने कहा - पवित्र जीवन जीने का यही रहस्य है। मैं भी मौत का प्रतिपल स्मरण करता हूँ।

सीख - अपने को पाप से बचाने का सिंपल तरीका - मौत का स्मरण करना है। मरना तो एक दिन है। तो क्यों न अच्छे कर्म का पूँजी जमा करें। कहते है इन्सान मरता है तो दो चीजें साथ चलते है अच्छा या बुरा सतकर्म या विक्रम। तो ये आपके ऊपर है कि आप क्या साथ ले जाना चाहते है।