Sunday, June 22, 2014

Hindi Motivational Stories.................................कर्ण की उदारता

कर्ण की उदारता

     एक बार भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के साथ बातचीत कर रहे थे। भगवान कृष्ण उस समय कर्ण की उदारता की बार-बार प्रशंसा कर रहे थे,  यह बात अर्जुन को अच्छा नहीं लगी। अर्जुन ने कहा - 'श्यामसुन्दर ! हमारे बड़े भाई धर्मराज जी से बढ़कर उदार तो कोई है नहीं, फिर आप उनके सामने कर्ण की इतनी प्रशंसा क्यों करते है ?' भगवान ने कहा - ' ये बात मैं तुम्हें फिर कभी समझा दूँगा। '

   कुछ दिनों के बाद अर्जुन को साथ लेकर भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठर के राजभवन के दरवाजे पर ब्राह्मण का वेश बनाकर पहुँचे। उन्होंने धर्मराज से कहा - ' हमको एक मन चन्दन की सुखी लकड़ी चाहिये। आप कृपा करके माँगा दे। ' उस दिन जोर की वर्षा हो रही थी। कहीं से भी लकड़ी लाने पर वह अवश्य भीग जाती। महाराज युधिष्ठर ने नगर में अपने सेवक भेजे, किन्तु संयोग की बात ऐसी कि कहीं भी चन्दन की सुखी लकड़ी सेर-आध-सेर से अधिक नहीं मिली। युधिष्ठर ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की - ' आज सुखा चन्दन मिल नहीं रहा है। आपलोग कोई और वस्तु चाहें तो तुरन्त दी जा सकती है। '

     भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - ' सुखा चन्दन नहीं मिलता तो  न सही। हमें कुछ और नहीं चाहिये। '

   वहाँ से अर्जुन को साथ लिये उसी ब्राह्मण के वेश में भगवान कर्ण के यहाँ पहुँचे। कर्ण ने बड़ी श्रद्धा से उनका स्वागत किया। भगवान ने कहा - ' हमें इसी समय एक मन सुखी लकड़ी चाहिये। '

   कर्ण ने दोनों ब्राह्मणों को आसन पर बैठाकर उनकी पूजा की। फिर धनुष चढ़ाकर उन्होंने बाण उठाया। बाण मार - मारकर कर्ण ने अपने सुन्दर महल के मूल्यवान किवाड़, चौखटें, पलंग आदि तोड़ डाले और लकड़ियों का ढेर लगा दिया। सब लकड़ियाँ चन्दन की थी। यह देखकर श्रीकृष्ण ने कर्ण से कहा - 'तुमने सुखी लकड़ियों के लिये इतनी मूल्यवान वस्तुऍ क्यों नष्ट की ?

  कर्ण हाथ जोड़कर बोले - ' इस समय वर्षा हो रही है। बाहर से लकड़ी माँगने में देर होगी। आप लोगों को रुकना पड़ेगा। लकड़ी भीग भी जायगी।  ये सब वस्तुऍ तो फिर बन जायेगी, किन्तु मेरे यहाँ आये अतिथि को निराश होना पड़े या कष्ट हो तो वह दुःख मेरे हृदय से कभी दूर नहीं होगा। '

 भगवान श्रीकृष्ण ने कर्ण को यशस्वी  होने का आशीर्वाद दिया और वहाँ से अर्जुन के साथ चले आये। लौटकर भगवान अर्जुन से कहा - 'अर्जुन ! देखो, धर्मराज युधिष्ठर के भवन के द्धार, चौखटे भी चन्दन की है। चन्दन की दूसरी वस्तुएँ भी राजभवन में है। लेकिन चन्दन माँगने  पर भी उन वस्तुअों को देने की याद धर्मराज को नहीं आयी और सुखी लकड़ी माँगने पर भी कर्ण ने अपने घर की मूल्यवान वस्तुऍ तोड़कर लकड़ी दे दी। कर्ण स्वभाव से उदार है और धर्मराज युधिष्ठर विचार करके धर्म पर स्थिर रहते है। मैं इसी से कर्ण की प्रशंसा करता हूँ। '

 सीख - हमें यह शिक्षा मिलती है की परोपकार, उदारता, त्याग तथा अच्छे कर्म करने का स्वाभाव बना लेना चाहिये। जो लोग नित्य अच्छे कर्म नहीं करते और सोचते है की कोई बड़ा अवसर पर महान कार्य करेंगे उनको अवसर आने पर भी सूझता ही नहीं। और जो छोटे-छोटे अवसरों पर भी त्याग तथा उपकार करने का स्वाभाव बना लेता है, वही महान कार्य करने में भी सफल होता है।

Friday, June 20, 2014

Hindi Motivational Stories............................. लिखित मुनि की सचाई

लिखित मुनि की सचाई

  ये बहुत पुरानी पुराणों की कहानी है जिस में सच्चाई को समझने और उसका दण्ड ख़ुशी से स्वीकार करने की एक कला को बताया है और ये योगी या तपस्वी सहज कर सकते है। उत्तर दक्षिण में एक गाँव में शंख और लिखित नाम के दो मुनि थे। दोनों सगे भाई थे। दोनों अलग - अलग आश्रम बनाकर रहते थे और भगवान का भजन करते थे। ये दोनों मुनि धर्मशास्त्र के बड़े भरी विद्वान थे। इन्होने स्मृतियाँ बनायीं है। शंख मुनि बड़े  भाई थे और लिखित छोटे।
 
   एक बार लिखित मुनि अपने बड़े भाई शंख मुनि से मिलने के उनके आश्रम गये। शंख मुनि उस समय वन में गये थे। और लिखित मुनि को भूख लगी थी तो उसने आश्रम के पास में लगे वृक्ष का पक्का हुआ फल तोड़कर खाने लगे और उसी समय शंख मुनि वहाँ आ गये। अपने छोटे भाई को देख उन्हें प्रसन्नता हुई और हाथ में फल देख कर उन्हें कुछ खेद भी हुआ। उन्होंने पूछा "लिखित !  ये फल तुम्हें कहा से मिला ? ' लिखित मुनि ने कहा -'भैया ! यह तो आपके आश्रम के वृक्ष से मैंने तोड़ा है। ' शंख मुनि ने कहा - कोई बिना पूछे किसी की वस्तु ले तो उस कार्य को क्या कहा जायेगा ? लिखित मुनि ने कहा - चोरी  शंख मुनि ने कहा - चोरी करने वाले को क्या करना चाहिये ? लिखित मुनि ने कहा - उसे राजा के पास जाकर अपनी बात बताना चाहिये और जो दण्ड मिले उसे भोगना चाहिये। अगर कोई ऐसा नहीं करता तो मरने के बाद यमराज के दूत उन्हें पकड़कर नरक में डाल देते है। और बहुत दुःख देते है।

  शंख मुनि ने कहा - ' तुमने मुझ से पूछे बिना मेरे आश्रम के फल लेकर चोरी का पाप किया है। अब तुम राजा के पास जाकर इस पाप का दण्ड ले लो और उसके बाद ही यहाँ आओ। '

        लिखित मुनि वहाँ से राजा के पास गये और सारी बात बता दी और अपनी अपराध का सजा सुनाने के लिए कहा राजा ने कहा -'जैसे राजा दण्ड देता है, वैसे ही क्षमा भी कर सकता है, मैं आपका अपराध क्षमा करता हूँ। लिखित मुनि बोले -' धर्मशास्त्र के नियम मुनिलोग बनाते है। राजा को तो प्रजा से उन नियमो का पालन कराना चाहिये। मैं  क्षमा लेने नहीं आया, दण्ड लेने आया हूँ। मेरे बड़े भाई ने स्नेहवश, मेरा कर्तव्य सुझाकर मुझे यहाँ भेजा है। मुझे अपराध का दण्ड दो। '

  राजा को मुनि की बात मानना पड़ा। उन दिनों चोरी के अपराध का दंड था चोर के दोनों हाथ काट लेना।  राजा की आज्ञा से जल्लादने मुनि के दोनों हाथ काट लिये। हाथ काट जाने से लिखित मुनि को दुःख नहीं हुआ।  वे बड़ी प्रसन्नता से शंख मुनि के आश्रम में लौट आये और बोले -'भैया ! मैं अपराध का दण्ड ले आया। '

          शंख मुनि छोटे भाई को ह्रदय से लगाया और कहा - तुमने बहुत अच्छा किया। आओ, अब स्नान करके दोपहर की संध्या करें।  नदी के जल में स्नान करने जब में डूबे तो तैरने के लिए जब लिखित मुनि ने अपने हाथ बढ़ाये तो दोनों हाथ पुरे निकल आये। वे समझ गए कि यह उनके बड़े भाई की कृपा का फल है। उन्होंने बड़ी नम्रता से पूछा -' भैया ! जब मेरे हाथ उगा देने थे तो आपने ही उन्हें यहाँ क्यों नहीं काट लिया ? '

     शंख मुनि बोले - 'दण्ड देना राजा का काम है। दूसरा कोई दण्ड दे तो वो पाप होगा।  लेकिन कृपा करना तो सदा ही श्रेष्ठ है। इसलिये तुम्हारे ऊपर कृपा करके मैंने तुम्हारे हाथ ठीक कर दिये। '

 सीख - बिना पूछे किसी की कोई भी वास्तु लेना चोरी है, यह बात इस कहानी से समझ में आती है। और साथ में सजा देना राजा का काम है कोई और दे तो पाप हो जाता है। कृपा करना श्रेष्ठ है और हर कोई  ये कर सकता है। और ऐसा कृपा करने के लिए पहले बहुत तपस्या करना पड़ता है। 

Hindi Motivational Stories....................... एक दयालु नरेश

एक दयालु नरेश

          एक राजा बड़े धर्मात्मा और दयालु थे। किन्तु उन से भूल से कोई एक पाप हो गया था। जब उनकी मृत्यु हो गयी, तब उन्हें लेने यमराज के दूत आये। यमदूतों ने राजा को कोई कष्ट नहीं दिया। यमराज ने उन्हें  कहा था कि वे राजा को आदरपूर्वक नारको के पास से आनेवाले रास्ते से ले आवें। राजा भूल से जो पाप हुआ था, उसका इतना ही दण्ड था।

    यमराज के दूत राजा को लेकर जब नर्क के पास पहुँचे तो नर्क में पड़े प्राणियों की चीखने, चिल्लाने, रोने की आवाज़ सुनकर राजा का ह्रदय घबरा उठा। और वे वहाँ से जल्दी-जल्दी जाने लगे। और उसी समय नर्क में पड़े जीवों ने पुकारकर प्रार्थना की - ' महाराज ! आपका कल्याण हो ! हम लोगों पर दया करके आप कुछ क्षण और यहाँ खड़े रहिये। आपके शरीर को छू कर जो ह्वा हमारी तरफ आ रही है उस से हम लोगो की जलन और पीड़ा एकदम दूर हो जाती है। हमें बड़ा सुख मिल रहा है। ' राजा ने उन जीवों की बात सुनकर कहा - ' मित्रो ! यदि मेरे यहाँ खड़े रहने से आप लोगो को सुख मिलता है तो मैं पत्थर की भाँति अचल होकर यही खड़ा रहूँगा। मुझे यहाँ से अब आगे नहीं जाना है। '

     यमदूतों ने राजा से कहा - ' आप तो धर्मात्मा है। आपके खड़े होने का यह स्थान नहीं है। आपके लिए तो स्वर्ग में उत्तम स्थान बनाये गए है। यह तो पापी जीवों के रहने का स्थान है। आप यहाँ से जल्दी चलो। ' राजा ने कहा - ' मुझे स्वर्ग नहीं चाहिए। भूखे-प्यासे रहना और नरक की आग में जलते रहना मुझे अच्छा लगेगा, यदि अकेले मेरे दुःख उठाने से उन सब लोगो को सुख मिले। प्राणियों की रक्षा करने से उन्हें सुखी करने में जो सुख है वैसा सुख तो स्वर्ग या ब्रह्मलोक में भी नहीं है। '

             उसी समय वहाँ धर्मराज तथा इंद्रा आये। धर्मराज ने कहा..... 'राजन,! मैं आपको स्वर्ग ले जाने के लिये आया हूँ। अब आप चलो '  राजा ने कहा - ' जब तक ये नरक में पड़े जीव इस कष्ट से नहीं छूटेंगे, मैं यहाँ से कही नहीं जाऊँगा। ' धर्मराज बोले - ' ये सब पापी जीव है। इन्होंने कोई पुण्य नहीं किया है। ये नरक से कैसे छूट सकते है ?' राजा ने कहा - ' मैं अपना सब पुण्य इन लोगों को दान कर रहा हूँ। आप इन लोगों को स्वर्ग ले जाये। इनके बदले मैं अकेले नरक में रहूँगा।  '  राजा की बात सुनकर देवराज इन्द्र ने कहा - 'आपके पुण्य को पाकर नरक के प्राणी दुःख से छूट गये है। देखिये ये लोग अब स्वर्ग जा रहे है। अब आप भी स्वर्ग चलिये। '

राजा ने कहा - ' मैंने तो अपना सब पुण्य दान कर दिया। अब आप मुझे स्वर्ग में चलने को क्यों कहते है ?
देवराज हँसकर बोले - 'दान करने से वस्तु घटती नहीं, बढ़ जाती है। आपने इतने पुण्यों का दान किया, यह दान उन सब से बड़ा पुण्य हो गया। अब आप हमारे साथ पधारें। दुःखी प्राणियों पर दया करने से नरेश अनन्तः काल तक स्वर्ग का सुख भोगते रहे।

सीख - दया धर्म का मूल है। अगर हम दुसरो पर दया करेंगे तो उसका पुण्य तो मिलेंगा ही। इस लिए हर प्राणी मात्र पर दया कर उनकी सेवा करना हमारा अपना परम धर्म है।
  

Hindi Motivational Stories............................ महर्षि दधीचि

महर्षि दधीचि

   महर्षि अथर्वा की पत्नी शान्ति से दधीचि जी का जन्म हुआ था। और बचपन से ही दधीचि बड़े शान्त, परोपकारी और भगवान के भक्त थे। उन्हें भगवान का भजन करना और तपस्या में लगे रहना, यही अच्छा लगता था। कुछ बड़े होने पर पिता से आज्ञा लेकर वे तपस्या करने चले गये और हिमालय पर्वत के एक पवित्र शिखर पर सैकड़ों वर्षो तक तप करते रहे।

      पुराणों में ऐसी बहुत सी दृश्य लिखे गए है। उस काल में कुछ ऐसी बात हुई की असुर और देवताओं में लड़ाई हुई और त्वष्टा के पुत्र वूत्रासुर ने स्वर्ग लोक पर अधिकार कर लिया और देवताओं को उसे जीत ने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। तो सब भगवान नारायण के शरण में गये। और उपाय पूछा तो भगवान नारायण जी ने कहा - ' वूत्रासुर को कोई नहीं मार सकता। वह शेष जी का भक्त था। अगर उसे मारना ही है तो एक ही उपाय है महर्षि दधीचि की हड्डियों से बना वज्र के द्वारा इंद्रा ही मार सकते है। महर्षि दधीचि इतनी बड़ी तपस्या की है कि उनकी हड्डियों में अपार शक्तियाँ है और वे इतने परोपकारी है की माँगा ने पर वो अपनी हड्डियाँ अवश्य दे देंगे। '

   सभी देवता दधीचि के आश्रम गये और दधीचि उनको देख उनका स्वागत किया और कारण पूछा तब इंद्रा ने सारी बात बताई। दधीचि ने कहा - ' उसने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा, मैं उसे बिना कारण शाप नहीं दे सकता। अब आप ही बताइये कि मैं कैसे आपको सहयोग दूँ।' इंद्रा ने कहा ' भगवान नारायण ने बताया है आप की हड्डियों में अपार शक्तियाँ है और उस का द्वारा बने वज्र से ही वूत्रासुर को हार हो सकती है दूसरा कोई उपाय नहीं है। और आपकी कृपा हो तो हम विजय बन सकते है हम आपसे प्रार्थना करते है। ये कहा कर देवताये दधीचि के आगे हाथ जोड़कर खड़े रहे।'

  महर्षि दधीचि बहुत प्रसन्न हुवे।  और बोले - ' यह तो बहुत उत्तम बात है। मृत्यु तो एक दिन आना है। और किसी का उपकार करने में मृत्यु हो जाय, इस से उत्तम बात और क्या होगी। मैं अभी शरीर छोड़ रहा हूँ। आप लोग मेरी सब हड्डियाँ ले लें। '  महर्षि ने आसन लगाया, आँखे बंद किये और योग के द्वारा शरीर छोड़ दिया। और जंगली जानवर आकर उन्होंने दधीचि के देह का सब चमड़ा और मांस आदि चाट लिये। उनकी बची सारी हड्डियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया। उसी वज्र से इंद्रा ने वूत्रासुर को मारा। और स्वर्ग का अधिकारी बने।

सीख - परोपकारी बनो। दुसरो का उपकार करने के लिये अपनी शरीर की हड्डियाँ तक देने वाले महर्षि दधीचि मरकर भी अमर हो गये। जब तक पृथ्वी रहेगी, लोग उनका गुणगान करेंगे उन्हें याद करेंगे और आदर से सिर झुकायेंगे।

  

Thursday, June 19, 2014

Hindi Motivational Stories..................अतिथि-सेवा

अतिथि-सेवा

     हम सभी जनते है यात्रा में थके, भूखे-प्यासे जब कोई घर देखकर वहाँ जाते है। तो हमरे मन की क्या दशा होती है, यह तो यात्रा में जिसने कभी थककर कहीं जाना पड़ा हो तो उसे पता होता है। ऐसे अतिथि को बैठने के लिए आसान देना, मीठी बात कहा कर उसका स्वागत करना उसे हाथ- पैर धोने तथा पीने को जल देना और हो सके तो भोजन करना बड़े पुण्य का काम है। और इस के विपरीत जो अपने घर आये अतिथि को फटकारता और निराश करके लौटा देता है, उसके सारे पुण्य नष्ट हो जाते है। महाराज संकृति के पुत्र महाराज रन्तिदेव बड़े ही अतिथि-सेवा भावी थे। महाराज रन्तिदेव इतने बड़े अतिथि-सेवी थे कि अतिथि की इच्छा जानते ही उसकी आवशक वस्तु उसे दे देते थे। उनके यहाँ रोज हजारों अतिथि आते थे। इस प्रकार बाँटते-बाँटते महाराज का सब धन समाप्त हो गया। वे कंगाल हो गये।

    महाराज रन्तिदेव निर्धन हो जाने पर राजमहल छोड़ दिया। स्त्री-पुत्र के साथ वे जंगल के रस्ते यात्रा करने लगे। क्षत्रिय को भिक्षा नहीं माँगना चाहिए, इस लिए वन के कन्द, मूल, फल आदि से वे अपना तथा परिवार का काम चलते थे। बिना माँगे कोई कुछ दे देता तो ले लेते थे। इस तरफ वह एक दिन ऐसे वन में पहुँच गए जहा उन्हें जल तक नहीं मिला और वह जंगल इतना बड़ा था की वहाँ से बाहर निकलने में ही उन्हें कई दिन लग गए पुरे 48 दिन तक वह और उनका परिवार भूखे प्यासे भटकते रहे और 49 वे दिन वे एक बस्ती में आ गए जहाँ उन्हें एक मनुष्य ने बड़े आदर के साथ उनका स्वागत किया और घी से बना खीर, हलवा और शीतल जल लाकर दिया।

   महाराज रन्तिदेव बड़ी शान्ति से वह सब सामान लेकर भगवान को भोग लगाया। 48 दिनों के बाद उपवास से मरने-मरने को रहे महाराज के मन में उस समय भी यही दुःख था कि जीवन में पहली बार आज किसी अतिथि को भोजन कराये बिना उन्हें भोजन करना पड़ेगा। और उसी समय एक ब्राह्मण वहाँ आये वे भूखे थे। उन्होंने भोजन माँगा। राजा रन्तिदेव बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बड़े आदर से ब्राह्मण को भोजन कराया। जब ब्राह्मण भर पेट भोजन करके चले गये, तब बचे भोजन को राजा ने परिवार के सभी को एक जैसा बांटकर दे दिया। अपना भाग लेकर वे भोजन करने जा रहे थे कि एक भूखा शूद्र आ गया। राजाने उसे भी भोजन कराया। लेकिन शूद्र के जाते ही एक और अतिथि आ पहुँचा। उसके साथ कुछ कुत्ते थे जो बहुत भूखे थे। राजा ने उस अतिथि तथा कुत्तों को भी भोजन कराया। अब उनके पास सिर्फ थोड़ा सा पानी बचा था। जैसे ही राजा पानी पीने लगे उसी समय एक चाण्डाल वह आया और कहा - महाराज मेरा प्यास के कारण प्राण निकले जा रहे है अगर दो बून्द पानी मिल जाता तो आपकी बड़ी कृपा होगी।

  महाराज रन्तिदेव की आँखों में आंसू आ गये। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की -' प्रभो ! यदि मेरे इस जल-दान का कुछ पुण्य हो तो उसका फल मैं यही चाहता हूँ कि संसार के दुःखी प्राणियों का दुःख दूर हो जाय। ' और फिर बड़े प्रेम से महाराज ने उस चाण्डाल को वह बचा हुआ पानी पिला दिया।

   चाण्डाल के जाते ही महाराज भूख और प्यास के मारे बेहोश होकर गिर पड़े। लेकिन उसी समय वहाँ भगवान ब्रह्मा, विष्णु, शंकर और धर्मराज प्रगट हो गये। और यही लोग चाण्डाल, ब्राह्मण, शूद्र आदि रूप में रन्तिदेव की परीक्षा लेने आये थे। और रन्तिदेव की अतिथि-सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिये।

सीख - इस कहानी से यही सीख मिलता है कि अगर अपने एक भी गुण जीवन में धारण कर लिए और उस पर अटल रहे, चाहे कुछ भी हो जाय यहाँ तक की आपको उसके लिए अपने प्राण ही क्यों न देने पड़े। तो आपका कल्याण निश्चित है। आपको भगवान का दर्शन होगा और उनका प्यार मिलेगा , जैसे रंतिदेव को उनके अतिथि-सेवा के प्रभाव से भगवान ने उन्हें दर्शन दिया।

   

   

Wednesday, June 18, 2014

Hindi Motivational Stories............................गोभक्ति और गुरुभक्ति

गोभक्ति और गुरुभक्ति 

  अयोध्याके चक्रवर्ती सम्राट महाराज दिलीप के कोई संतान नहीं थी। एक बार वे अपनी पत्नी के साथ गुरु वसिष्ठ जी के आश्रम में गये और पुत्र के लिये महर्षि से प्रार्थना की। महर्षि वसिष्ठ ने ध्यान करके राजा के पुत्र न होने का कारण जान लिया और बोले - 'महाराज! आप देवराज इन्द्र से मिलकर जब स्वर्ग से पृथ्वी पर आ रहे थे तो रास्ते में खड़ी कामधेनु को देखा ही नहीं। उनको प्रणाम नहीं किया। इस लिए कामधेनु ने आपको शाप दे दिया है कि उनकी संतान की सेवा किये बिना आपको पुत्र नहीं होगा। '

   महाराज दिलीप बोले - 'गुरुदेव! सभी गाये कामधेनु की संतान है, गो-सेवा तो बड़े पुण्य का काम है। मैं गायों की सेवा करूँगा। ' वसिष्ठ जी ने बताया - 'मेरे आश्रम जो नन्दिनी नाम की गाय है, वह कामधेनु की पुत्री है। आप उसी की सेवा करें।

   महाराज दिलीप सबेरे ही नन्दिनी के पीछे-पीछे वन में गये। नन्दिनी जब खड़ी होती तो वे खड़े रहते, वह चलती तो उसके पीछे चलते, उसके बैठने पर ही वे बैठते, उसके जल पिने पर ही वे जल पीते वे उसके शरीर पर एक मक्खी तक बैठने नहीं देते थे। संध्या समय जब नन्दिनी आश्रम लौटती तो उसके पीछे-पीछे महाराज लौट आते। महारानी सुदक्षिणा उस गौ की पूजा करती थी। रात को उसके पास दीपक जलती थी और महाराज गोशाला में गाय के पास भूमि पर ही सोते थे। इस तरह सेवा कार्य का  एक महीना पूरा हुआ और एक दिन वन में महाराज कुछ सुन्दर पुष्पों को देखने लगे और इतने में नन्दिनी आगे चली गयी। कुछ ही क्षण में ही गाय के डकारने की बड़ी करुणा ध्वनि सुनायी पड़ी। महाराज उस ध्वनि की तरफ दौड़ कर वहाँ पहुँचे तो देखते है कि एक झरने के पास एक बड़ा भरी सिंह उस सुन्दर गाय को दबाये बैठा है। सिंह को मारकर गाय को छुड़ाने के लिए महाराज ने धनुष्य चढ़ाया, किंतु जब तरकस से बाण निकलने लगे तो दाहिना हाथ तरकस में ही चिपक गया।
   
 आश्चार्य में पड़े महाराज दिलीप से सिंह ने मनुष्य की भाषा में कहा - 'राजानं ! मैं कोई साधारण सिंह नहीं हूँ। मैं भगवान शिव का सेवक हूँ। अब आप लौट जाइये। जिस काम के करने में अपना बस न चले, उसे छोड़ देने में कोई दोष नहीं होता।  मैं भूखा हूँ। यह गाय मेरे भाग्य से यहाँ आ गयी है। इस से मै अपनी भूख मिटाऊंगा। '

   महाराज दिलीप बड़ी नम्रता से बोले - ' आप भगवान शिव के सेवक है, इसलिये मैं आपको प्रणाम करता हूँ। सत्पुरूषों के साथ बात करने तथा थोड़े क्षण भी साथ रहने से मित्रता हो जाती है। आपने जब अपना परिचय मुझे दिया ही है तो मेरे ऊपर इतनी कृपा और कीजिये कि इस गौ को छोड़ दीजिये और इसके बदले में मुझे खाकर अपनी भूख मिटा लीजिये। ' सिंह ने महाराज को बहुत समझाया कि एक सम्राट को गाय के बदले अपना प्राण नहीं देने चाहिए। किन्तु महाराज दिलीप अपनी बात पर ढूढ बने रहे। एक शरणागत गौ महाराज के देखते देखते मारी जाय, इस से उसे बचाने में अपना प्राण दे देना उन्हें स्वीकार था। अंत में सिंह ने महाराज की बात मान ली और महाराज का चिपका हाथ तरकस से छूट गया। महाराज धनुष और तरकस अलग रख दिया और सिर झुकाकर वे सिंह के आगे बैठ गये।

   महाराज दिलीप समझते थे कि अब सिंह उनके ऊपर कूदेगा और उन्हें खा जायेगा। परन्तु उनके ऊपर आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। नन्दिनी उन्हें मनुष्य की भाषा में पुकारकर कहा - 'महाराज ! आप उठिये। यहाँ कोई सिंह नहीं है, यह तो मैंने आपकी परीक्षा लेने के लिये माया दिखायी है। और अभी आप पत्ते के दोने में दुहकर मेरा दूध पी लीजिये। आपको गुणवान तथा प्रतापी पुत्र होगा। '

  महाराज ऊठे। उन्होंने उस कामधेनु गौ को प्रणाम किया और साथ जोड़कर बोले - 'माता ! आपके दूध पर पहले आपके बछड़े का अधिकार है। उसके बाद बचा दूध गुरुदेव का है। आश्रम लौटने पर गुरुदेव की आज्ञा से ही मैं थोड़ा-सा दूध ले सकता हूँ। ' महाराज की गुरुभक्ति तथा धर्म-प्रेम से नन्दिनी और भी प्रसन्न हुई। शाम को आश्रम लौटने पर महर्षि वसिष्ठ की आज्ञा से महाराज ने नन्दिनी का थोड़ा-सा दूध पिया। समय आने पर महाराज दिलीप के पास प्रतापी पुत्र हुआ।

 सीख - गुरु की आज्ञा और पूरी निष्ठा से कार्य जो करते है और उसके सयम- नियम, मर्यादा और अपनी क़ुरबानी तक देने के लिए जो तैयार रहते है। उनकी हर इच्छा पूरी होती है वे ही महान बनते है।

Hindi Motivational Stories...................... योग का विज्ञान

योग का विज्ञान 

  एक बहुत समझदार व्यापारी थे। एक बार वे बहुत सारे गहने और पैसे लेकर दूसरे शहर जा रहे थे। जब स्टेशन पर टिकट ले रहे थे, तो उन्होंने जान लिया कि एक चोर भी उनके पीछे-पीछे चल रहा है। गाड़ी में भी वह उनके सामने की सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद एक स्टेशन आया, व्यापारी नीचे उतरे, मौका मिलते ही चोर ने उनका सारा सामान खोलकर देखा परन्तु कुछ भी नहीं मिला। जब गाड़ी चली तो व्यापारी आकर सीट पर बैठ गया। थोड़ी देर बाद फिर एक सेटशन आया, व्यापारी फिर नीचे उतरे और प्लेटफार्म पर टहलने लगे। चोर ने भी फिर से सारा सामान खोजा परन्तु कहीं भी पैसे और गहने नही मिले। उसे बहुत आश्चर्य हुआ। इसके बाद सेठ का उतरने का स्टेशन आ गया। उन्होंने चोर से पूछा, तुम्हारे मन में एक प्रशन है ना ? चोर ने कहा, आपको कैसे मालूम है ? मुझे मालूम है, सेठ ने कहा, जब-जब मैं नीचे उतरा तब-तब तुम ने मेरा सामान चेक किया कुछ ढूंढा, तुम्हें वो पैसे और गहने चाहिये ना ? हाँ सेठ, मैंने स्टेशन पर देखा था, आपके पास गहने और पैसे है जरूर, परन्तु इतना ढूंढने पर भी मुझे वो नहीं मिले, अब बता दीजिये, आपने कहाँ छिपाये ? सेठ ने खड़े होते हुये कहा, अपना तकिया उठा, मैंने सारे पैसे और गहने इस तकिये के नीचे ही तो छिपाये थे, मुझे पक्का पता था कि तू सब कुछ ढूंढेगा, पर स्वयं के तकिये के नीचे नहीं ढूंढेगा इसलिये मैंने उन्हें यही छिपा दिया।

सीख - हर विपरीत स्तिथी में घबरा ने बजाय समझ से काम लेना चाहिये। जिस से हमारा नुकसान भी न हो और समाने वाले को मौका भी न मिले।