Friday, July 4, 2014

Hindi Motivational Stories....................छत्रपति महाराज शिवाजी की उदारता

छत्रपति महाराज शिवाजी की उदारता 


   एक बार एक बालक जो तेरा-चौदह वर्ष का था। रात में किसी प्रकार छिपकर उस कमरे में पहुँचे जहा शिवाजी महाराज सो रहे थे। अब उसने देखा की महाराज सो रहे है। तो उसने तलवार निकाली महाराज को मारने ही वाला था कि पीछे से तानाजी ने उसका हाथ पकड़ लिया। छत्रपति शिवाजी महाराज के विश्वासी सेनापति तानाजी ने उस लड़के को पहले ही देख लिया था और वे यह देखना चाहते थे कि वह क्या करने आया है।  इसी बीच शिवाजी की नींद खुल गयी। उन्होंने पूछा बालक से -'तुम कौन हो ? और यहाँ क्यों आये हो?बालक ने कहा - ' मेरा नाम मालोजी है। मैं आपकी हत्या करने आया था। ' शिवाजी बोले - 'तुम मुझे क्यों मारना चाहते हो ? मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है ? ' बालक बोला - ' आपने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा है। लेकिन मेरी माँ कई दिनों से भूखी है। हम बहुत गरीब है। आपके शत्रु शुभगारा ने मुझे कहा था कि यदि मैं आपको मार डालू तो वे मुझे बहुत धन देंगे। '

 इतने में तानाजी बोले - 'दुष्ट लडके ! धन के लोभ से तू  महाराष्ट्र के उद्धारक का वध करना चाहता था? अब मरने के लिए तैयार हो जा। ' बालक तनिक भी डरा नहीं। उसने तानाजी के बदले शिवाजी से कहा - ' महाराज ! मैं मरने से डरता नहीं हूँ। मुझे अपने मरने की चिन्ता भी नहीं है। लेकिन मेरी माँ बीमार है और कई दिनों से भूखी है। वह मरने को पड़ी है। आप मुझे एक बार घर जाने दीजिये। उनसे माफ़ी माँगकर माता के चरणों में प्रणाम करके मैं फिर आपके पास लौट आऊंगा। मैंने आपको मारने का यत्न किया। अब आप मुझे मार डाले; यह तो ठीक ही है.परन्तु मुझे थोड़ा-सा समय दीजिये। '

      तानाजी बोले - ' तू हमें बातो से धोखा देकर भाग नहीं सकता। ' बालक बोला - ' मैं भागूँगा नहीं। मैं मराठा हूँ, मराठा झूठ नहीं बोलता। ' शिवाजी ने उसे घर जाने की आज्ञा दे दी। बालक घर गया। दूसरे दिन सबेरे जब छत्रपति महाराज शिवाजी राजदरबार में सिंहासन पर बैठे थे, तब द्धारपालने आकर सूचना दी कि एक बालक महाराज के दर्शन करना चाहता है। बालक को बुलाया गया। वह वही मालोजी था। मालोजी दरबार में आकर छत्रपति को प्रणाम किया। और बोला - 'महाराज ! मैं आपकी उदारता का आभारी हूँ। माता का दर्शन कर आया हुँ. अब आप मुझे मृत्यु दण्ड दे।

    छत्रपति महाराज सिँहासन से ऊठे। और बालक को गले से लगा लिया और कहा -' यदि तुम्हारे-जैसे वीर एवं सच्चे लोगों को प्राण दण्ड दे दिया जायेगा तो देश में रहेगा कौन ?
 तुम्हारे-जैसे बालक ही तो महाराष्ट्र के भूषण है। '

  इस तरह बालक मालोजी शिवाजी महाराज की सेना में नियुक्त हो गया। छत्रपति उसकी माता की चिकित्सा के लिए राजवैध को भेजा और बहुत-सा धन उसे उपहार में दिया।

सीख - सुना है -"दिल साफ तो मुराद हासील " " सच्चे दिल पर साहेब राजी "
 इस लिये सच्चे बनो नेक बनो।
 तो दिल की हर मुराद पूरी होगी। 

Thursday, July 3, 2014

Hindi Motivational Stories..............................भामाशाह का त्याग

भामाशाह का त्याग 

     ये उस समय की बात है जब चित्तौड़ पर अकबर की सेना ने अधिकार कर लिया था। महाराणा प्रताप अरावली पर्वतो के वनों में अपने परिवार तथा राजपूत सैनिकों के साथ जहाँ-तहाँ भटकते-फिरते थे। महाराणा तथा उनके छोटे बच्चों को कभी-कभी दो-दो, तीन-तीन दिनों तक घास के बीजों की बनी रोटी तक नहीं मिलती थी। चित्तौड़ के महाराणा और सोने के पलंग पर सोने वाले उनके बच्चे भूखे-प्यासे पर्वत की गुफाओं में घास-पत्ते खाते और पत्थर की चट्टान पर सोया करते थे। लेकिन महाराणा प्रताप को इन सब कष्टों की चिन्ता नहीं थी। उन्हें एक ही धुन थी कि शत्रुओं से देश का चित्तौड़ की पवित्र भूमि का उद्धार कैसे किया जाय।

   किसी के पास काम करने का साधन न हो तो उसका अकेला उत्साह क्या काम आवे। महाराणा प्रताप और दूसरे सैनिक भी कुछ दिन भूखे-प्यासे रह सकते थे: किन्तु भूखे रहकर युद्ध कैसे चलाया जा सकता है। छोड़ो के लिये, हथियारों के लिए, सेना को भोजन देने के लिए तो धन चाहिये। और महाराणा के पास फूटी कौड़ी नहीं थी। उनके राजपूत और भील सैनिक अपने देश के लिये मर-मिटने को तैयार थे। उन देशभक्त वीरों को वेतन नहीं लेना था: किन्तु बिना धन के घोड़े कहाँ से आवें, हथियार कैसे बने, मनुष्य और घोड़ो को भोजन कैसे दिया जाय। इतना भी प्रबन्ध न हो तो दिल्ली के बादशाह की सेना से युद्ध कैसे चले। महराणा प्रताप को बड़ी निराशा हो रही थी येही सब बातें सोचकर। और अंत में एक दिन महाराणा ने अपने सरदारों से बिदा ली, भीलों को समझकर लौटा दिया। प्राणों से प्यारी जन्म-भूमि को छोड़कर महराणा राजस्थान से कहीं बाहर जाने को तैयार हुए।

      जब महाराणा अपने सरदारों को रोता छोड़कर महारानी और बच्चों के साथ वन के मार्ग से जा रहे थे, महाराणा के मन्त्री भामाशाह घोडा दौड़ाते आये और घोडे से कूदकर महाराणा के पैरों पर गिरकर फुट-फुटकर रोने लगे -'आप हम लोगों को अनाथ करके कहाँ जा रहे है ?'

    महाराणा प्रताप भामाशाह को उठाकर ह्रदय से लगाया और आँसू बहाते हुए कहा - 'आज भाग्य हमारे साथ नहीं है। अब यहाँ रहने से क्या लाभ ? मैं इसलिये जन्म-भूमि छोड़कर जा रहा हूँ कि कहीं से कुछ धन मिल जाय तो उस से सेना एकत्र करके फिर चित्तौड़ का उद्धार करने लौटूँ। आप लोग तब तक धैर्य धारण करें। ' भामाशाह ने हाथ जोड़कर कहा -'महाराणा ! आप मेरी एक प्रार्थना मान लें। ' राणाप्रताप बड़े स्नेह से बोले -'मन्त्री ! मैंने आपकी बात कभी टाली है क्या ?'

      भामाशाह के पीछे उनके बहुत-से-सेवक घोड़ों पर अशर्फियों के थैले लादे ले आये थे। भामाशाह ने महाराणा के आगे उन अशर्फियों का बड़ा भारी ढेर लगा दिया और फिर हाथ जोड़कर बड़ी नम्रता से कहा - 'महाराणा ! यह सब धन आपका ही है। मैंने और मेरे बाप-दादाओ ने चित्तौड़ के राजदरबार की कृपा से ही इन्हें इकट्टा किया है। आप कृपा करके इसे स्वीकार कर लीजिये और इस से देश का उद्धार कीजिये। '

     महाराणा प्रताप भामाशाह को गले से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसू की बुँदे टपक रही थी। वे बोले - ' लोग प्रताप को देश का उद्धारक कहते है, किन्तु इस पवित्र भूमि का उद्धार तो तुम्हारे-जैसे उद्धार पुरुषों से होगा। तुम धन्य हो भामाशाह !'

  उस धन से महाराणा प्रताप ने सेना इकट्ठी की और फिर मुगलसेना पर आक्रमण किया। मुगलों के अधिकार की बहुत सी भूमि महाराणा प्रताप ने जीत ली और उदयपुर में अपनी राजधानी बना ली।

सीख - महाराणा प्रताप की वीरता जैसे राजपूताने के इतिहास में विख्यात है, वैसे ही भामाशाह का त्याग भी विख्यात है। ऐसे त्यागी पुरुष ही देश के गौरव होते है। जो व्यक्ति समय पर अपना सहयोग देता है उसे कही जन्मों का पुण्य प्राप्त होता है।

Tuesday, July 1, 2014

Hindi Motivational Stories........................पन्ना धायका त्याग

पन्ना धायका त्याग 

 
     चित्तौड़ के महाराणा संग्राम सिंह की वीरता प्रसिद्ध है। उनके स्वर्गवासी होने पर चित्तौड़ की ग़द्दी पर राणा विक्रमादित्य बैठे, किन्तु वे शासन करने की योग्यता नहीं रखते थे। उन में न बुद्धि थी और न वीरता। इस लिए चित्तौड़ के सामन्तो और मंत्रियों ने सलाह करके उनको गद्दी से उत्तार दिया तथा महाराणा संग्राम सिंह के छोटे कुमार उदय सिंह को गद्दी पर बैठाया।

    उदय सिंह की अवस्था उस समय केवल छ: वर्ष की थी। उनकी माता रानी करुणावती का स्वर्गवास हो चूका था। पन्ना नाम की एक धाय उनका पालन-पोषण करती थी। और उस समय राज्य का संचालन दासी-पुत्र बनवीर करता था। वह उदय सिंह का संरक्षक बनाया गया था।

    बनवीर के मन में राज्य का लोभ आया। उसने सोचा कि यदि विक्रमादित्य और उदय सिंह को मार दिया जाय तो सदा के लिए वह राजा बन सकेगा। सेना और राज्य का संचालन उसके हाथ में था ही। एक दिन रात में बनवीर नंगी तलवार लेकर राजभवन में गया और उसने सोते हुए राजकुमार विक्रमादित्य का सिर काट लिया। और जूठी पत्तल उठानेवाले एक बारी ने बनवीर को विक्रमादित्य की हत्या करते देख लिया। वह ईमानदार और स्वामिभक्त बारी बड़ी शीघ्रता से पन्ना के पास आया और उसने कहा - ' बनवीर राणा उदय सिंह की हत्या करने शीघ्र ही यहाँ आयेगा। कोई उपाय करके बालक राणा के प्राण बचाओ। '

 पन्ना धाय अकेली बनवीर को कैसे रोक सकती थी। उसके पास कोई उपाय सोचने का समय भी नहीं था। लेकिन उसने एक उपाय सोच लिया। उदय सिंह उस समय सो रहे थे। उनको उठाकर पन्ना ने एक टोकरी में रखा दिया और टोकरी पत्तल से ढककर उस बारी को देकर कहा - ' इसे लेकर तुम यहाँ से चले जाओ। और वीरा नदी के किनारे मेरा रास्ता देखना। ' उदय सिंह को तो वह से हटा दिया पर इस से भी काम पूरा नहीं हुआ। अगर बनवीर को पता लगा कि उदय सिंह को छिपाकर कहीं भेजा गया है। तो अवश्य ही घुड़सवार भेजकर पकड़ लेगा। अब पन्ना ने एक और उपाय सोचा। उसका भी एक पुत्र था। उसका पुत्र चन्दन की अवस्था भी छ: वर्ष की थी। उसने अपने पुत्र को उदय सिंह के पलंग पर सुलाकर रेशमी चदर उढ़ा दी और स्वयं एक ओर बैठ गयी। जब बनवीर रक्त में सनी तलवार लिये वहाँ आया और पूछने लगा - '  उदय सिंह कहाँ है ?' तब पन्ना ने बिना एक शब्द बोले अँगुली से अपने सोते लड़के की ओर संकेत कर दिया। हत्यारे बनवीर ने उसके निरपराध बालक के तलवार द्दारा दो टुकड़े कर दिये और वहाँ से चला गया।

   अपने स्वामी की रक्षा के लिये अपने पुत्र का बलिदान करके बेचारी पन्ना रो भी नहीं सकती थी। उसे झटपट वहाँ से नदी किनारे जाना था, जहाँ बारी उदय सिंह को लिये उसका रास्ता देख रहा था। पन्ना ने अपने पुत्र की लाश ले जाकर नदी में डाल दी और उदय सिंह को लेकर मेवाड़ से चली गयी। उसे अनेक स्थानों पर भटकना पड़ा। अन्त में देवरा के सामन्त आकाशाह ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

      और आखिर में बनवीर को अपने पाप का दण्ड मिला। बड़े होने पर राणा उदय सिंह चित्तौड़ की गद्दी पर बैठे। पन्ना धाय उस समय जीवित थी। राणा उदय सिंह माता के समान उसका सम्मान करते थे।

सीख - पन्ना की स्वामी भक्ति महान है। स्वामी के लिये अपने पुत्र का बलिदान करने वाली पन्ना माई धन्य है !................  इस धरती पर ऐसे ऐसे महान व्यक्ति हुए है। चाहे पद छोटा हो या बड़ा लेकिन व्यक्ति महान बनता है अपने गुणों से। इस लिये पन्ना धाय को सन्सार के लोग भाले भूल जाय लेकिन इतिहास में उनका नाम हमेशा अमर रहेगा।
 

Sunday, June 29, 2014

Hindi Motivational Stories..................सावधानी और दयालुता

सावधानी और दयालुता

          चित्तौड़ के बड़े राजकुमार चन्द्रस शिकार खेलने निकले थे। अपने साथियों के साथ वे दूर निकल गये थे। उन्होंने उस दिन श्रीनाथ द्वारे में रात बिताने का निश्चय किया था। जब शाम होने पर वे श्रीनाथद्वारे की ओर लौटने लगे, तब पहाड़ी रास्ते में एक घोड़ा मरा हुआ पड़ा दिखायी दिया। राजकुमार ने कहा - ' किसी यात्री का घोड़ा यहाँ मर गया है। घोड़ा आज का ही मरा है। यहाँ से आगे ठहरने का स्थान तो श्रीनाथद्दारा ही है। वह यात्री वहीं गया होगा। '

    श्रीनाथद्दारे पहुँचकर राजकुमारने सब से पहले यात्री की खोज की। उनके मन में एक ही चिन्ता थी कि यात्रा में घोड़ा मरने  यात्री को कष्ट होगा। राजकुमार उसे दूसरा घोड़ा दे देना चाहते थे। लेकिन जब सेवकों ने बताया कि यात्री यहाँ नहीं आया है, तब राजकुमार और चिन्तित हो गये। वे कहने लगे - 'अवश्य वह यात्री मार्ग भूलकर कहीं भटक गया है। वह इस देश से अपरिचित होगा। और रात्रि में वन में पता नहीं, वह कहाँ जायेगा। तुम लोग टोलियाँ बनाकर जाओ और उसे ढूंढ़कर ले आओ।

      राजकुमार की आज्ञा पाकर उनके सेवक मशालें जलाकर तीन,तीन चार-चार की टोलियाँ बनाकर यात्री को ढूंढने निकल पड़े। बहुत भटकने पर उन में से एक टोली के लोगों को किसी ने पुकारा। जब उस टोली के लोग पुकारने वाले के पास पहुँचे, तब देखा कि एक बूढ़ा और एक नवयुवक एक घोड़े पर बहुत-सा सामान लादे पैदल चल रहे है। वे लोग बहुत घबराये और थके हुए थे। राजकुमार के सेवकों ने कहा - ' आप लोग डरे नहीं। हम लोग आपको ही ढूंढने निकले है। '

           बूढ़े ने बड़े आश्चर्य से कहा - ' हम लोग तो अपरिचित है। विपति के मारे घर-द्दार छोड़कर श्रीनाथजी की शरण लेने निकल पड़े थे।  और आज ही रस्ते में हमारा घोड़ा गिर पड़ा और मर गया। यहाँ हमलोग रास्ता भूलकर भटक पड़े। और आप लोग हम लोगों को भला कैसे ढूंढने निकले ?  तब सेवकों ने कहा - ' हमारे राजकुमार ने आपका मरा घोड़ा देख लिया था। वे प्रत्येक बात में बहुत सावधानी रखते है। और उन्होंने जान लिए की घोडा मरा है तो यात्री भटक गया होगा। इस लिए उन्होंने हम लोगो को भेजा आप लोगोँ को ढूंढने।

   एक राजकुमार इतनी सावधानी रखें और ऐसे दयालु हो, यह दोनों यात्रियों को बहुत अदभुत लगा। श्रीनाथद्दारे आकर उन्होंने राजकुमार के प्रति कृत्यज्ञता प्रकट की। राजकुमार चन्द्रस बोलो - ' यह तो प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह सावधान रहे और कठिनाई में पड़े लोगों की सहायता करे। मैंने तो अपने कर्तव्य का ही पालन किया है। '

सीख - हर मनुष्य के दिल में इस तरह सब के लिए दया और प्रेम जागे तो सन्सार स्वर्ग हो जाएगा।

Saturday, June 28, 2014

Hindi Motivational Stories..........................रघुपति सिंह की सचाई

रघुपति सिंह की सचाई 


     ये उस समय की बात है जब अकबर बादशाह की सेना ने राजपूताने के चित्तौड़ गढ़ पर अधिकार कर लिया था। महाराणा प्रताप अरावली पर्वत के वनों में चले गये थे। महाराणा के साथ राजपूत सरदार भी वन में जाकर छिप गये थे। महाराणा और उनके सरदार अवसर मिलते ही मुग़ल-सैनिकों पर टूट पड़ते थे और उन में मार-काट मचाकर फिर वनों में छिप जाते थे।

   महाराणा प्रताप के सरदारों में से एक सरदार का नाम रघुपति सिंह था। वह बहुत ही वीर था। अकेले ही वह चाहे जब शत्रु की सेना पर धावा बोल देता था और जब तक मुग़ल-सैनिक सावधान हों, तब तक सैकड़ों को मारकर वन-पर्वतों में भाग जाता था। मुग़ल-सेना रघुपति सिंह के मारे घबरा उठी थी। मुग़लों के सेना पति ने रघुपति सिंह को पकड़ने वाले को बहुत बड़ा इनाम देने की घोषणा कर दी। इस की योजना बनाई गयी।

   रघुपति सिंह वनों और पर्वतों में घुमा करता था। एक दिन उसे समाचार मिला कि उसका लड़का बहुत बीमार है और घड़ी-दो-घड़ी में मरने वाला है। रघुपति का ह्रदय पुत्र प्रेम से भर आया, वह वन में से घोडे पर चढ़कर निकला और अपने घर की ओर चल पड़ा। पुरे चित्तौड़ को बादशाह के सैनिकों ने घेर रखा था। प्रत्येक दरवाजे पर बहुत कड़ा पहरा था। पहले दरवाजे पर पहुँचते ही पहरेदार ने कड़ककर पूछा - कौन है ? रघुपति सिंह झूठ नहीं बोलना चाहता था, उसने अपना नाम बता दिया। इस पर पहरेदार बोला - 'तुम्हें पकड़ने के लिये सेना पति ने बहुत बड़ा इनाम घोषित किया है। मैं तुम्हें बन्दी बनाऊँगा। ' रघुपति सिंह - 'भाई ! मेरा लड़का बीमार है। वह मरने ही वाला है। मैं उसे देखने आया हूँ। तुम मुझे अपने लडके का मुँह देख लेने दो। मैं थोड़ी देर में ही लौटकर तुम्हारे पास आ जाऊँगा। ' पहरेदार सिपाही बोला - ' यदि तुम मेरे पास न आये तो ?' रघुपति सिंह - मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि अवश्य लौट आऊँगा। '

  पहरेदार ने रघुपति सिंह को नगर में जाने दिया। वे अपने घर गये। अपनी स्त्री और पुत्र से मिले और उन्हें आश्वासन देकर फिर पहरेदार के पास लौट आये। पहरेदार उन्हें सेनापति के पास ले गया। सेनापति सब बातें सुनकर पूछा - 'रघुपति सिंह ! तुम नहीं जानते थे की पकड़े जाने पर हम तुम्हें फाँसी दे देंगे ? तुम पहरेदार के पास दोबारा क्यों लौट आये ? ' रघुपति सिंह ने कहा - 'मैं मरने से नहीं डरता। राजपूत वचन देकर उससे टलते नहीं और किसी के साथ विश्वासघात  भी नहीं करते।

   सेनापति रघुपति सिंह की सच्चाई देखकर आश्चर्य में पड़ गया। उस ने पहरेदार को आज्ञा दी - ' रघुपति सिंह को छोड़ दो। ऐसे सच्चे और वीरको मार देना मेरा ह्रदय स्वीकार नहीं करता। '

सीख - सच्चाई का जीवन में कितना महत्व है ये इस कहानी से पता चलता है। इस लिये जीवन में सदा सच्चाई को धारण करो। 

  

Friday, June 27, 2014

Hindi Motivational stories....... रिक्शा वाले का लड़का बना (I.A .S. ऑफिसर )

रिक्शा वाले का लड़का बना (I.A .S. ऑफिसर )

वाराणसी के यहाँ एक रिक्शा वाले का लड़का बना (I.A .S. ऑफिसर )  नाम है गोविंद जैस्वाल जो पहले ही परीक्षा में 48 रैंक से पास हुआ 474 विद्यार्थियों में।
 उनका परिवार गरीब था और वो ऐसे जगह पर रहकर पढ़ाई किया जिस के बारे में हम सोच भी नहीं सकते है उनके घर के आसपास हमेशा कारखानों की व जनरेटर्स की आवाज़े आती थी।
  गोविन्द अपने कानो में कपास रख कर पढ़ाई की और जब उसकी कॉलेज की पढ़ाई   पूरी हुई तो आगे की पढ़ाई के लिए पिताजी ने गाँव की जमीन बेचकर 40,000 रुपये दिए और दिल्ली भेजा। 
उसके बाद उसकी बहन ने उसका ध्यान दिया और उस समय अस -पास के लोग उनका मजाक उड़ा देते थे। और गोविंद उन्हें नज़र अंदाज़ कर अपने पढ़ाई पर ध्यान देते रहे।  
बहुत परेशानी के बाद भी हार नहीं मनी और 
आखिर वो दिन आया गोविंद की खड़ी मेहनत रंग लाया और 
आज वो एक I.A .S. ऑफिसर बना। 



Hindi Motivational Stories......................... शरणागत

शरणागत 

  भारत में एक ये भी प्रथा थी। जब कोई व्यक्ति मुसीबत के समय में वह  किसी राजा के शरण में जाता है तो राजा उस की रक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता और उस शरण आये व्यक्ति की रक्षा करता। ये उस समय की बात है जब दिल्ली के सिंहासन पर अलाउदीन बादशाह का राज था। और बादशाह का सब से प्रिया सरदार था मुहम्मदशाह। मुहम्मदशाह पर बादशाह की बड़ी कृपा थी और इसी से वह बादशाह का मुँहलगा हो गया था।

    एक दिन बातें करते समय हँसी में मुहम्मदशाह ने कोई ऐसी बात कह दी कि बादशाह क्रोध से लाल हो उठा। उसने मुहम्मदशाह को फाँसी पर चढ़ा देने की आज्ञा दे दी। बादशाह की आज्ञा सुनकर मुहम्मदशाह के तो प्राण सुख गये। किसी प्रकार मुहम्मदशाह दिल्ली से भाग निकला। अपने प्राण बचाने के लिये उसने अनेक राजाओं से प्रार्थना की, किन्तु किसी ने उसे शरण देना स्वीकार नहीं किया। बादशाह को अप्रसन्न करने का साहस किसी को नहीं हुआ। विपत्ति का मारा मुहम्मदशाह इधर-उधर भटक रहा था। अन्त में वह रणथम्भौर के चौहान राजा हमीर के राज-दरबार में गया। उसने राजा से अपने प्राण बचाने की प्रार्थना की। राजा ने कहा - 'राजपूत का पहला धर्म है शरणागत की रक्षा। आप मेरे यहाँ निश्चिन्त होकर रहो। जब तक मेरे शरीर में प्राण है, कोई आपका बाल भी बाँका नहीं कर सकता। '

    मुहम्मदशाह रणथम्भौर में रहने लगा। और कुछ ही दिनों में बादशाह अलाउदीन को इस का पता लगा तो उसने राजा हमीर के पास संदेश भेजा - 'मुहम्मदशाह मेरा भगोड़ा है। उसे फाँसी का दण्ड हुआ है। तुम उसे तुरंत मेरे पास भेज दो। ' राजा हमीर ने उत्तर भेजा - 'मुहम्मदशाह मेरी शरण आया है मैंने उसे रक्षा का वचन दिया है। मुझे चाहे सारे संसार से युद्ध करना पड़े, भय या लोभ में आकर मैं शरणागत  का त्याग नहीं करूँगा। '

   अलाउदीन को राजा का पत्र पढ़कर बहुत क्रोध आया। उसने इसे अपमान समझा। उसने उसी समय सेना को रणथम्भोर पर चढाई करने को कहा। छोटे छोटे दलों के समान पठानो की बड़ी भारी सेना चल पड़ी। रणथम्भोर के किले को उस सेना ने दस मील तक चारों ओर से घेर लिया। अलाउदीन ने राजा के पास फिर संदेश भेजा कि वह मुहम्मदशाह को भेज दे। बादशाह समझाता था कि राजा हमीर बादशाह की भारी सेना देखकर डर जाएगा, और मुहम्मदशाह को हवाले करेगा। किन्तु राजा हमीर ने स्पष्ट कह दिया - ' मैं किसी भी प्रकार शरणागत को नहीं दूँगा। '

   बस फिर क्या था ! युद्ध प्रारम्भ हो गया। बादशाह की सेना बहुत बड़ी थी, किन्तु राजपूत वीर तो मौत से भी दो -दो हाथ करने को तैयार थे। भयंकर युद्ध महीनों चलता रहा। दोनों ओर के हज़ारों वीर मारे गये। अंत में एक दिन मुहम्मदशाह ने स्वयं राजा हमीर से कहा - 'महाराज ! मेरे कारण आप बहुत दुःख उठा चुके। मुझ से अब आपके वीरों का नाश नहीं देखा जाता। मैं बादशाह के पास चला जाना चाहता हूँ। ' राजा हमीर बोले - ' मुहम्मदशाह ! तुम फिर ऐसी बात मत कहना। जब तक मेरे शरीर में प्राण है, तुम यहाँ से बादशाह के पास नहीं जा सकते। राजपूत का कर्तव्य है शरणागत-रक्षा। मैं अपने कर्तव्य का पालन प्राण देकर भी करूँगा।

   जैसे-जैसे समय बीतता गया, राजपूत सेना के वीर घटते गये। रणथम्भोर के किले में भोजन-सामग्री कम होने लगी। उधर अलाउदीन की सेना में दिल्ली से आकर नयी-नयी टुकड़ियां बढ़ती ही जाती थी। अंत में रणथम्भोर के  किले की सब भोजन-सामग्री समाप्त हो गयी। राजा हमीर ने ' जौहर-व्रत ' करने का निश्चय किया। राजपूत स्त्रिया जलती चिता में कूद गयी और केसरिया वस्त्र पहनकर सब राजपूत वीर किले का फाटक खोलकर निकल पड़े। शत्रुअों से लड़ते-लड़ते वे मारे गये। मुहम्मदशाह भी राजा हमीर के साथ ही युद्ध- भूमि में आया और युद्ध में मारा गया। विजय बादशाह अलाउदीन जब रणथम्भोर के किले में पहुँचा तो उसे केवल जलती चिता की राख और अंगारे मिले।

सीख - शरणगत की रक्षा के लिये अपने सर्वस्व का बलिदान करने वाले वीर महापुरुष संसार की इस पवित्र भारत-भूमि पर ही हुए है। शरणगत की रक्षा का ये सब से बड़ा उदहारण है। और आज के समय में सब को माया ने अपने जाल में फंसा लिया है। माया जाल से बचने के लिये हम सब अब ईश्वर की शरण लेना होगा। तब ही हम सुख शांति से जी पाएँगे।