Tuesday, August 6, 2013

Ho God Thank you for being with me.......

I Think once in a day take time and sit in a corner and say to God with whole Heart ...
" Thank you "

Monday, August 5, 2013

"क्रोध किसी भी रूप में आये वो आपके लिए बुरा ही है"


 क्रोध किसी भी रूप में आये वो आपके लिए बुरा ही है 
इस लिए इस से मुक्ति  के लिए अपने आप से कुछ किजिये 
अगर कुछ नहीं होता है तो डॉक्टर से कंसल्ट करे (मानोविज्ञानिक )
या फिर आपके नजदीक कोई मैडिटेशन सेंटर  से  जरुर संपर्क करे 
क्रोध के विपरित गुण शांति, प्रेम,आनंद का प्रोयोग करे इस से बहुत 
असर होगा  फिर भी क्रोध आता है किसी बात से तो अपने देवी देवता के 
तस्वीर के सम्माने जाकर क्रोध करे या अपने दोस्तों से इस विषय में बात करो.
 


Saturday, August 3, 2013

"विश्व स्तनपान दिवस"




 


                                                       स्तनपान के फ़ायदे....

स्तनपान के अनेक फ़ायदे हैं। नवजात शिशु के लिए माँ के दूध से बेहतर और कोई भी दूध नहीं होता है।
 इससे दोनों माँ और बच्चे को अनेक लाभ पहुँचता है। स्तनपान के अनेक फ़ायदे हैं-

    माँ का दूध सुपाच्य होता है जिससे यह शिशु को पेट सम्बन्धी गड़बड़ियों से बचाता है।
    स्तनपान शिशु की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक होता है।
    स्तनपान से दमा और कान सम्बन्धी बीमारियाँ नियंत्रित रहती है, क्योंकि माँ का दूध शिशु की नाक और गले में प्रतिरोधी त्वचा बना देता है।
    स्तनपान से जीवन के बाद के चरणों में उदर व श्वसन तंत्र के रोग, रक्त कैंसर, मधुमेह तथा उच्च रक्तचाप का ख़तरा कम हो जाता है।
    स्तनपान से शिशु की बौद्धिक क्षमता भी बढ़ती है क्योंकि स्तनपान कराने वाली माँ और उसके शिशु के बीच भावनात्मक रिश्ता प्रगाढ़ होता है।
    स्तनपान कराने वाली माताओं को स्तन या गर्भाशय के कैंसर का ख़तरा कम होता है।
    शोधों से सिद्ध हुआ है कि लम्बे तक स्तनपान करने वाले बच्चे बाद के जीवन में उतने ही अधिक समय तक मोटापे से बचे रह सकते हैं।
    माँ के दूध में मिलने वाले तत्त्व मेटाबोलिज्म बेहतर करते हैं।
    गर्भावस्था के समय या स्तनपान के दौरान माँ का जो भी खान-पान रहता है वह बाद में बच्चे के लिए भी पसंदीदा बन जाता है।
    माँ के दूध में पाए जाने वाले डी.एच.ए.(D.H.A.) व ए.ए.(A.A.) फैटी एसिड मस्तिष्क की कोशिकाओं के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
    स्तनपान से बच्चे का आई. क्यू. (Intelligence Quotient) अच्छी तरह विकसित होता है।

कृत्रिम दूध और माँ के दूध में अंतर.....

कृत्रिम दूध, माँ के दूध की गुणवत्ता, का अनुकरण करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन सही मायने में यह अनुकरण हो ही नहीं सकता है।
यह इसलिए कि माँ के दूध में अनेक गुणधर्म हैं, जिनका अनुकरण करना नामुमकिन है। कृत्रिम दूध में माँ के दूध के जैसी सामग्री कार्बोहाइड्रेट,
प्रोटीन, वसा और विटामिन इत्यादि डाल दिए जाते हैं, किंतु इनकी मात्रा नियत रहती है। माँ के दूध में इनकी मात्रा बदलती रहती है।
कभी माँ का दूध गाढा रहता है तो कभी पतला, कभी दूध कम होता है तो कभी अधिक, जन्म के तुरंत बाद और जन्म के कुछ हफ्तों बाद या महीनों बाद बदला रहता है।
इससे दूध में उपस्थित सामग्री की मात्रा बदलती रहती है, और यह प्रकृति का बनाया गया नियम है कि माँ के दूध में बच्चे की उम्र के साथ बदलाव होते रहते हैं।
भौतिक गुणवत्ता के अलावा, माँ के दूध में अनेक जैविक गुण होते हैं, जो कि कृत्रिम दूध में नहीं होते हैं।
उदाहरण के लिए माँ के दूध देने से माँ-बच्चे के बीच लगाव, माँ से बच्चे के रोग से बचने के लिए प्रतिरक्षा मिलना और अन्य।
इसके बावज़ूद जिन माँ को अपना दूध नहीं हो पाता है, उनके लिए फ़िर यही जानवर या कृत्रिम दूध का सहारा होता है। इसके बारे में अन्य जगह ज़िक्र किया गया है।

स्तनपान से लाभ
माँ को लाभ बच्चे को लाभ
माँ को बच्चे से लगाव खाने की प्राप्ति
संतुष्टि बच्चे का पूर्ण विकास
बोतल के दूध को बनाने और साफ़ करने के झंझट से बचना प्रतिरक्षा या इम्युनिटी (immunity) में बढ़ाव
फ्री- पैसा बचाना बुद्धि में विकास
सदा उपलब्ध- दिन में या रात में, घर में या बाहर में संक्रमित बीमारियों से बचाव, जैसे कि दस्त और चर्म रोग
अपने ऊपर भरोसा एलर्जी से बचाव
माहवारी को रोकना, जो कि तुरंत फिर गर्भ होने को रोक सकता है मोटापा से बचाव
अपने बच्चे को संक्रमित बीमारियों से बचाना जो कि गंदे बोतल या उसके निप्पल से हो सकती हैं माँ-बच्चे के बीच लगाव ‌

माँ का दूध सर्वोतम आहार

  • एकनिष्‍ठ स्‍तनपान का अर्थ जन्‍म से छः माह तक के बच्‍चे को माँ के दूध के अलावा पानी का कोई ठोस या तरल आहार नहीं देना चाहिए।
  • माँ के दूध में काफ़ी मात्रा में पानी होता है जिससे छः माह तक के बच्‍चे की पानी की आवश्‍यकताऐं गर्म और शुष्‍क मौसम में भी पूरी हो सकें।
  • माँ के दूध के अलावा बच्‍चे को पानी देने से बच्‍चे का दूध पीना कम हो जाता है और संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है।
  • प्रसव के आधे घण्‍टे के अन्‍दर-अन्‍दर बच्‍चे के मुँह में स्‍तन देना चाहिए।
  • ऑपरेशन से प्रसव कराए बच्‍चों को 4- 6 घण्‍टे के अन्‍दर जैसे ही माँ की स्थिति ठीक हो जाए, स्‍तन से लगा देना चाहिए।

Fitness Expert Karan`s Interview on Radio Madhuban


Different exercises for different age groups and some special exercises for those who have Problems as per their need so get contact with experts and start exercises as per direction and get best result..........Do not follow  T.V. or listen to any one sayings.

Khush Raho.................

खुद को समय ज़रूर दे आपकी पहली ज़रूरत आप खुद हो!!!!!!!!!!!!!

Have a Most Happiest Day Today..........experience it now only
 

Thursday, August 1, 2013

upkar......

उपकार शब्द का अनुभव के लिए बस एक बार उस शब्द में थोड़ी देर के लिए खो जाईये बस। ……. 

Monday, July 22, 2013

" गुरु पूर्णिमा "

 गुरु पूर्णिमा, गोवर्धन (मथुरा)

गुरु पूर्णिमा / व्यास पूर्णिमा / मुड़िया पूनों आषाढ़ मास की पूर्णिमा को कहा जाता है। इस दिन गोवर्धन पर्वत की लाखों श्रद्धालु परिक्रमा देते हैं। बंगाली साधु सिर मुंडाकर परिक्रमा करते हैं क्योंकि आज के दिन सनातन गोस्वामी का तिरोभाव हुआ था। ब्रज में इसे 'मुड़िया पूनों' कहा जाता है। आज का दिन गुरु–पूजा का दिन होता है। इस दिन गुरु की पूजा की जाती है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। वैसे तो 'व्यास' नाम के कई विद्वान हुए हैं परंतु व्यास ऋषि जो चारों वेदों के प्रथम व्याख्याता थे, आज के दिन उनकी पूजा की जाती है। हमें वेदों का ज्ञान देने वाले व्यास जी ही थे। अत: वे हमारे 'आदिगुरु' हुए। उनकी स्मृति को बनाए रखने के लिए हमें अपने-अपने गुरुओं को व्यास जी का अंश मानकर उनकी पूजा करनी चाहिए। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में नि:शुल्क शिक्षा ग्रहण करते थे तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरु की पूजा किया करते थे और उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा अर्पण किया करते थे। इस दिन केवल गुरु की ही नहीं अपितु कुटुम्ब में अपने से जो बड़ा है अर्थात माता-पिता, भाई-बहन आदि को भी गुरुतुल्य समझना चाहिए। गुरु पूर्णिमा जगत गुरु माने जाने वाले वेद व्यास को समर्पित है। माना जाता है कि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ मास की पूर्णिमा को हुआ था। वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेदव्यास ने आज ही के दिन की थी। वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था। उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है। ऐसे जगत गुरु के जन्म दिवस पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है।गुरु को गोविंद से भी ऊंचा कहा गया है। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है- उसका निरोधक। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। अर्थात अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को ‘गुरु’ कहा जाता है। गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है। ‘व्यास’ का शाब्दिक संपादक, वेदों का व्यास यानी विभाजन भी संपादन की श्रेणी में आता है। कथावाचक शब्द भी व्यास का पर्याय है। कथावाचन भी देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप पौराणिक कथाओं का विश्लेषण भी संपादन है। भगवान वेदव्यास ने वेदों का संकलन किया, 18 पुराणों और उपपुराणों की रचना की। ऋषियों के बिखरे अनुभवों को समाजभोग्य बना कर व्यवस्थित किया।

 व्रत और विधान.........

    इस दिन (गुरु पूजा के दिन) प्रात:काल स्नान पूजा आदि नित्य कर्मों से निवृत्त होकर उत्तम और शुद्ध वस्त्र धारण कर गुरु के पास जाना चाहिए।
    गुरु को ऊंचे सुसज्जित आसन पर बैठाकर पुष्पमाला पहनानी चाहिए। इसके बाद वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर तथा धन भेंट करना चाहिए। इस प्रकार श्रद्धापूर्वक पूजन करने से गुरु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
    गुरु के आशीर्वाद से ही विद्यार्थी को विद्या आती है। उसके हृदय का अज्ञानता का अन्धकार दूर होता है। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी, ज्ञानवर्धक और मंगल करने वाला होता है। संसार की संपूर्ण विद्याएं गुरु की कृपा से ही प्राप्त होती हैं और गुरु के आशीर्वाद से ही दी हुई विद्या सिद्ध और सफल होती है।
    गुरु पूर्णिमा पर व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।
    इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।
    इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाना चाहिए, अंधविश्वासों के आधार पर नहीं। गुरु पूजन का मन्त्र है-

    'गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:।'
    गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:।।

 क्या करें गुरु पूर्णिमा के दिन .....
    प्रातः घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ-सुथरे वस्त्र धारण करके तैयार हो जाएं।
    घर के किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाना चाहिए।
    फिर हमें 'गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये' मंत्र से पूजा का संकल्प लेना चाहिए।
    तत्पश्चात दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ना चाहिए।
    फिर व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम, मंत्र से पूजा का आवाहन करना चाहिए।
    अब अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा देना चाहिए।